ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत ऊर्जा थिंक टैंक एंबर ने अपनी एक नई रिपोर्ट में यूरोपीय संघ के साथ सीबीएएम के अनुपालन के लिए भारत की रणनीतियों को रेखांकित करते हुए कहा है कि भारत के भारी उद्योगों के अनुमानित कार्बन उत्सर्जन का 17 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा आधारित विद्युतीकरण से 2030 तक टाला जा सकता है। भारत के भारी उद्योगों को 2030 तक अपनी ऊर्जा खपत को पूरी तरह से डीकार्बोनाइज करने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए 120 गीगावाट की समर्पित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता की आवश्यकता होगी। रिपोर्ट में स्टील, सीमेंट, पेट्रोकेमिकल्स, एल्यूमीनियम और अमोनिया क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इन उत्सर्जन-गहन ‘भारी’ उद्योगों का डीकार्बोनाइजेशन न केवल भारत के औद्योगिक क्षेत्र के लिए, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण लाभ ला सकता है।
वर्तमान में, इन भारी उद्योगों में ऊर्जा की खपत का 11 प्रतिशत बिजली से आता है, जबकि बाकी जीवाश्म ईंधन-आधारित थर्मल ऊर्जा से आता है। उद्योग विकास अनुमानों के अनुसार, भारी उद्योगों के लिए बिजली की मांग में 45 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है। इस बढ़ी हुई मांग को नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने पर 18 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सकता है, जो नीदरलैंड के कुल वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है। यदि नई प्रौद्योगिकियां और सरकार का ग्रीन हाइड्रोजन मिशन सफल होते हैं, तो 2050 तक औद्योगिक ऊर्जा मिश्रण में साफ बिजली का हिस्सा तीन गुना हो सकता है, और 73.7 करोड़ टन के उत्सर्जन को रोका जा सकेगा।
सीबीएएम नियमों का एक समूह है, जिसका उद्देश्य यूरोपीय संघ में प्रवेश करने वाले सामान पर कार्बन उत्सर्जन के लिए उचित मूल्य निर्धारित करना है। सीबीएएम को यह सुनिश्चित करना है कि आयात किए गए सामान का कार्बन मूल्य, घरेलू उत्पादन के कार्बन मूल्य के समान हो। साथ ही कार्बन उत्सर्जन पर कमजोर विनियमन वाले गैर-यूरोपीय संघ देशों में उत्पादन स्थानांतरित करने से कंपनियों को हतोत्साहित कर स्वच्छ औद्योगिक उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए। एल्यूमीनियम, उर्वरक, सीमेंट इत्यादि जैसे कुछ ऐसे उद्योग हैं, जिन्हें यूरोपीय निर्यात के मामले में संभवतः अपेक्षाकृत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली की कल्पना करता है। कार्बन सीमा समायोजन तंत्र पहली बार बड़े पैमाने पर कार्बन समायोजन की पहल है और इसलिए भविष्य में कई देशों के लिए यह परीक्षा की कसौटी बन सकता है।