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जंग: इस्राइल के साथ हिजबुल्ला-हमास की लड़ाई और रूस-यूक्रेन युद्ध के पीछे के वैश्विक पैटर्न को समझें

थॉमस एल फ्रीडमैन
Updated Sat, 05 Oct 2024 04:30 AM IST

सार

इस्राइल के साथ हिजबुल्ला, हमास और ईरान की लड़ाई हो या रूस-यूक्रेन का युद्ध, इनके पीछे के पैटर्न को समझने के लिए हमें इन्हें उस व्यापक संघर्ष के संदर्भ में देखना होगा, जो आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शीतयुद्ध का स्थान लेते हुए दुनिया को दो धड़ों में विभाजित करने की दिशा में बढ़ रहा है।
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इस्राइल के पीएम नेतन्याहू और ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई (फाइल) - फोटो : ani


समावेशी गठबंधन में शामिल सभी देश लोकतांत्रिक नहीं हैं, पर अपने भविष्य को अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा सुरक्षित मानते हैं, जो जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए दुनिया को आर्थिक एकीकरण, खुलेपन और सहयोग के लिए प्रेरित कर रहा है। जबकि प्रतिरोधी गठबंधन में शामिल देशों का शासन क्रूर और अधिनायकवादी है, जो समावेशी दुनिया के प्रति अपने विरोध का उपयोग अपने समाजों के सैन्यीकरण को उचित ठहराने और सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए करता है। चीन दोनों खेमों में बंटा हुआ है, क्योंकि समावेशी गठबंधन तक पहुंच पर ही उसकी अर्थव्यवस्था निर्भर करती है, जबकि सरकार का नेतृत्व प्रतिरोधी गठबंधन की अधिनायकवादी प्रवृत्ति और हितों को साझा करता है।


यूक्रेन, गाजा और लेबनान में चल रहे युद्धों को इस वैश्विक संघर्ष के संदर्भ में देखना होगा। यूक्रेन यूरोप की समावेशी दुनिया में शामिल होने की कोशिश कर रहा था। वह रूस के दायरे से आजाद होकर यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहता था। इस्राइल और सऊदी अरब संबंधों को सामान्य बनाकर पश्चिमी एशिया में समावेशी दुनिया का विस्तार करने की कोशिश कर रहे थे। रूस ने यूक्रेन को पश्चिम (यूरोपीय संघ और नाटो) में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया और ईरान, हमास और हिजबुल्ला ने इस्राइल को पूर्व (सऊदी अरब के साथ संबंध) में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया। अगर यूक्रेन यूरोपीय संघ में शामिल हो जाता है, तो यूरोप के 'संपूर्ण और स्वतंत्र' होने की समावेशी दृष्टि लगभग पूरी हो जाएगी और रूस में व्लादिमीर पुतिन पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएंगे। 


दूसरी तरफ, अगर इस्राइल को सऊदी अरब के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की अनुमति दी गई, तो इससे न केवल उस क्षेत्र में समावेशी गठबंधन का व्यापक विस्तार होगा, बल्कि यह ईरान और लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हूती और इराक में ईरान समर्थक शिया लड़ाकों के दुस्साहसी प्रतिनिधियों को लगभग पूरी तरह से अलग-थलग कर देगा, जो सभी अपने मुल्कों को विफल राष्ट्र में तब्दील कर रहे हैं। वास्तव में, यह कहना कठिन है कि हिजबुल्ला और उसके नेता हसन नसरल्ला, जो इस्राइली हमले में मारे गए, से लेबनान और सुन्नी व ईसाई अरब जगत के कई हिस्सों में लोग कितनी नफरत करते थे, क्योंकि उन्होंने लेबनान का अपहरण कर उसे ईरानी साम्राज्यवाद का अड्डा बना दिया था।


पिछले दिनों मैं ओरिट पेर्लोव से बात कर रहा था, जो इस्राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन संस्थान के लिए अरब सोशल मीडिया पर नजर रखती हैं। उन्होंने बताया कि लेबनानी लोग नहीं चाहते कि बेरूत को गाजा की तरह नष्ट कर दिया जाए और वे वास्तव में गृहयुद्ध की वापसी से डरते हैं। लेकिन नसरल्ला के अंत को लेबनानी, इस्राइली और फलस्तीनी लोगों के लिए स्थायी रूप से बेहतर भविष्य में तब्दील करने के लिए अभी बहुत सारे कूटनीतिक कार्य किए जाने बाकी हैं। बाइडन-हैरिस प्रशासन अस्थायी समावेशी गठबंधन को रणनीतिक महत्व देने के लिए एक नेटवर्क बना रहा है। पूरी परियोजना का मुख्य बिंदु इस्राइल और सऊदी अरब के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का बाइडन टीम का प्रस्ताव है, जिसके लिए सऊदी अरब तैयार है, बशर्ते इस्राइल पश्चिमी तट में फलस्तीनी प्राधिकरण के साथ द्वि-राष्ट्र समाधान पर बातचीत शुरू करने के लिए सहमत हो। और समस्या यहीं पर आती है। कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा के समक्ष इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भाषण पर बारीकी से ध्यान दें, तो वह 'प्रतिरोधी' और 'समावेशी' गठबंधनों के बीच संघर्ष को अच्छी तरह समझते हैं। वास्तव में, यह उनके संयुक्त राष्ट्र भाषण का केंद्र बिंदु था।


उन्होंने अपने संबोधन के दौरान दो नक्शे दिखाए, एक का शीर्षक था ‘आशीर्वाद’ और दूसरा ‘अभिशाप’। अगर आप ‘अभिशाप’ वाले नक्शे को ध्यान से देखें, तो इसमें इस्राइल तो दिखाया गया है, लेकिन गाजा और इस्राइली कब्जे वाले पश्चिमी तट के साथ कोई सीमा नहीं दिखाई गई है (जैसे कि इसे पहले ही जोड़ दिया गया हो, जो इस्राइल का लक्ष्य भी है)। और यही समस्या है। नेतन्याहू दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि ईरान और उसके समर्थक यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र तक फैले समावेशी दुनिया की मुख्य बाधा हैं। मैं इससे असहमत हूं। इस पूरे गठबंधन का आधार सऊदी-इस्राइल सामान्यीकरण है, जो इस्राइल और उदारवादी फलस्तीनियों के बीच सुलह पर आधारित है।


यदि इस्राइल अब आगे बढ़ता है और एक संशोधित फलस्तीनी प्राधिकरण, जिसने ओस्लो शांति संधि को पहले ही स्वीकार कर लिया है, के साथ दो राष्ट्रों पर बातचीत शुरू करता है, तो यह कूटनीतिक झटका होगा, जो इस्राइल द्वारा हिजबुल्ला और हमास को दिए गए सैन्य झटके को और मजबूती प्रदान करेगा। इससे क्षेत्र में ‘प्रतिरोधी’ ताकतें पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएंगी और उनकी झूठी ढाल छीन ली जाएगी कि वे फलस्तीनी मुद्दे के रक्षक हैं। ईरान, हमास, हिजबुल्ला एवं रूस और यहां तक कि चीन के लिए भी इससे बड़ा कोई झटका नहीं होगा। लेकिन ऐसा करने के लिए नेतन्याहू को हिजबुल्ला, जिसे पार्टी ऑफ गॉड भी कहा जाता है, के नेतृत्व को खत्म करने के सैन्य जोखिम से भी बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाना होगा। ‘समावेशी दुनिया’ और ‘प्रतिरोधी दुनिया’ के बीच संघर्ष कई बातों पर आधारित है, लेकिन आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नेतन्याहू लेबनान में ‘पार्टी ऑफ गॉड’ पर किए गए प्रहार के बाद इस्राइल में उनको समर्थन दे रही ‘पार्टी ऑफ गॉड’ के जॉर्डन नदी से लेकर भूमध्य सागर तक संपूर्ण भू-भाग पर इस्राइली नियंत्रण के इरादों पर भी वैसा ही राजनीतिक प्रहार करें।
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