अस्तेय (चोरी न करना) और अपरिग्रह (भौतिक वस्तुओं से अनासक्ति) से दूर पड़ा मन लालच और पावर के संबंध को समझ नहीं पाता। फिर उस व्यक्ति या अधिकारी के बोध को ग्रहण लग जाता है; और फिर सही और गलत का फर्क समझने वाला कोई नहीं होता। पॉल एम ह्यूजेस अपने आर्टिकल, द लॉजिक ऑफ टेम्पटेशन में लिखते हैं, 'प्रलोभन को आम तौर पर नैतिक रूप से संदिग्ध माना जाता है, कुछ हद तक इसलिए, क्योंकि इसमें वह चाहत शामिल होती है, जो हमें अनैतिक, नासमझ, गैर-कानूनी, अनाकर्षक, या किसी और तरह से गलत या बुरा बनाती है।
इसलिए सरदार पटेल ने जिस नौकरशाही को स्टील फ्रेम कहा था, उसे दरकते देख ज्यादातर मामलों में एक आम आदमी सीधे शब्दों में कहना चाहता होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र में अधिकारियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। किसी शक्तिशाली व्यक्ति का पैसों के लिए घुटने टेकना हर उस व्यक्ति का बिखरना है, जो उसे आदर्श मानता है और उसकी तरह बनना चाहता है। तो फिर क्या किया जाए? अगर संस्थाएं, मूल्यों की रक्षा नहीं कर पा रहीं, तो फिर कौन करेगा? क्या एक नागरिक के ईमानदार होने से समाज के दरख्त उन दीमकों से बचते हैं या वे दरख्त तमाम संस्थाओं से भी चाहते हैं कि वे अपने बोध और तंत्र को इतना मजबूत करें कि कोई दीमक उस स्टील फ्रेम को भेद न सके।
इसके लिए हमें उस आदर्श की कल्पना करनी चाहिए, जो दार्शनिकों और आम व्यक्ति के लिए कोई दुरूह कार्य नहीं रहा। आखिर एक कार्यकारी अधिकारी वह प्रभावी नेतृत्व है, जिसका अनैतिक हो जाना उस अच्छाई से व्यक्ति का भरोसा उठा देता है, जो यह मानता है कि 'कलेक्टर साहब हैं, तो कुछ भी गलत नहीं होगा।'
शुरुआती यूनानी दार्शनिक हमेशा दो सवालों के जवाब ढूंढने में दिलचस्पी रखते थे: दुनिया क्या है? एक अच्छा इन्सान या एक अच्छा नेतृत्व क्या है? जैसा कि बताया गया है, डायोजनीज एथेंस की सड़क पर एक लैंप लेकर उस ईमानदार इन्सान या एक अच्छे नेता की तलाश में घूमते थे। और उन प्रश्नों पर सोचते थे कि हम कौन हैं और यहां क्यों हैं? आखिर में, हम कहां जा रहे हैं? आदर्श समाज नैतिकता और नीतिशास्त्र के यथार्थ को सहज मानता है, और अवश्यंभावी भी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि एथिक्स इन्सान की सही और गलत इच्छाओं के बीच के टकराव को सुलझाता है। नहीं तो संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की इतनी कठिन परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद बहुत से अधिकारियों का समझौते करना और थोड़े से लालच के चलते अनैतिक फैसले लेना विकसित भारत के सुनहरे भविष्य के लिए ग्रहण से कुछ भी कम नहीं है। ऐसे में किसी भी समाज के वर्तमान और भविष्य को उस एथिक्स या नैतिक कंपास की बेहद जरूरत होती है, जो सही और गलत इच्छाओं में लगातार फर्क करने के लिए हमारी समझ विकसित करने में मदद करता है।
एथिक्स हमें उस नैतिकता का मतलब समझाता है, जो मनुष्य के होने का यकीन है और जो प्लेटो के अनुसार, मनुष्य होने की सबसे बड़ी योग्यता है। नैतिक बने रहना मनुष्य की वह ऐतिहासिक उपस्थिति है, जो एथिक्स के लेंस से दर्ज होती है। नैतिक बने रहना नैतिकता की प्रकृति और स्रोत को खोजते रहना होता है, और उन मानदंडों की जांच करते रहना भी, जो नैतिक और अनैतिक व्यवहारों को वर्गीकृत करते हैं, और उन सिद्धांतों की, जो नैतिक मानक में बदलाव को निर्देशित करते हैं।
निश्चित रूप से जब कोई समाज भर्ती प्रक्रिया में एथिक्स को फिल्टर के रूप में उपयोग में लाता है, तो वह समय की नब्ज को भी समझता है। ये हमारे समाज के अनैतिक कार्य और खत्म होते मूल्य हैं, जिन्होंने एथिक्स की जरूरत पैदा की। किसी भी संसदीय प्रजातंत्र में, कार्यपालिका की संस्था उस आम आदमी और विधायिका के बीच सबसे जरूरी कड़ी होती है। इसलिए 2013 में यूपीएससी द्वारा भर्ती प्रक्रिया में एथिक्स के विषय को गंभीरता से लाना एक साहसी और समझदारी भरा कदम था, क्योंकि जीवन मूल्य पानी की उन बूंदों की तरह होते हैं, जो किसी समाज में ऊपर से नीचे पहुंचें, तो अच्छा होता है। और यह यूपीएससी ने किया। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि पावर और एथिक्स में कुछ कॉमन है। दोनों हमारे व्यवहार पर बहुत असर डालते हैं।
आज भी हमारे देश में बहुत से ऐसे सिविल सर्वेंट्स हैं, जो एथिक्स के रास्ते पर चलते हैं और देश को उन पर नाज भी है। वे ही भविष्य के सिविल सर्वेंट्स या उस पावर को ढूंढ़ते काफिले को भी एथिक्स के उन दुर्गम रास्तों से गुजरने की प्रेरणा देंगे। फिर एथिक्स के मार्ग पर चलने वाला वह सिविल सर्वेंट उस स्टील फ्रेम को दरकने से भी बचा पाएगा। पावर और लालच के अंधेरे में तब रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता 'द रोड नॉट टेकेंन' को याद करता हुआ वह कहेगा, आई टूक द रोड लेस ट्रैवल्ड बाय।