समृद्धि और सौष्ठवता की शीलवन्ती संज्ञा का अपराभिधान भारतीय-युवक है। वह संसार में, जड़-चेतन प्राणी में अमरता का गीत गाता है, कलुषताओं और विद्रूपताओं से ऊपर उठकर जीवन और जगत् में केवल रमणीयता एवं दीप्ति का लास्य लसित करना है। उसके मानसिक, धरातल से संगच्छध्वं संवदध्वं स वो मनासि जानताम् (साथ-साथ चले, साथ-साथ रहें, जानें) की मंत्रवाक् प्रस्पुटित होती है, जिससे विश्व में मांगलिक विभूति की प्रतिष्ठा होती है तथा व्यवहार में परस्परोपग्रहो जीवानाम् (एक दूसरे की मदद्) रूप शाश्वत पारस्परिक प्रेम व्यवहार संवलित अमर गीत का गूंज सुनाई पड़ता है।
पर्यावरण की सुरक्षा, संरक्षा, संवर्धन वही युवक कर सकता है, जो बाहर और भीतर दोनों रूपों से संस्कृत हो, संस्कारित हो, सम्मानित हो तथा जड़ चेतन में सार्वभौमिक जीवन की प्रतिष्ठा करने में समर्थ हो। वह धूम ज्योतिसलिलमरुता सन्निपातः रूप निर्जीव मेघ को भी जीवनदाता ‘कामरूपं मघोनः के रूप में प्रतिष्ठित कर उसे मेघो मेहतीतिसतः जीवनदायको वा मेघः (जीवनदाता मेघ) के रूप में धारक कर, संसार के कल्याण के लिए, अपना मधुरिम संदेश प्रेषित करने का सामथ्र्य धारण करता है। जिसे वृक्षों में, वनस्पतियों में सहज सहोदरत्व की प्राप्ति होती है, जो उन्हें पानी पिलाए, भोजन खिलाए बिना स्वयं जलग्रहण भी नहीं करता। श्रंगार एवं प्रसाधन रूचिकर होने के बावजूद भी वृक्षों में प्रथम किसलय पुष्प आने पर वह स्वयं जीवन का महोत्सव मनाने लगता है।
पातुं न प्रथम व्यवस्यति युष्पाष्वपितेषु वा।
नादत्ते प्रियमंडनापि स्नेहेन या पल्लवम्।
आद्यः वः कुसुमप्रसुतिसमये यस्यां भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्। (अभिज्ञानशाकुन्तलम् 4)
वह संस्कृति शिरोमणि युवक न केवल अपने अस्तित्व को स्वीकारता है। बल्कि संसार के, पर्यावरण जगत् के वृक्ष, वनस्पति, पवन, अग्नि जल पशुपक्षी सबको अपने ही समान जीवन मानकर अपने लिए वांक्ष्य आचरण ही उन पर्यावरणीय जगत् के साथ आचरित कर, शोक मोह से भी तर जाता है। जीवन में यह ईशावास्यीय सूक्ति पूर्ण रूप से सफल एवं सफलता को प्राप्त होकर संसार कल्याण के लिए प्रतिष्ठित एवं पुष्टित हो जाती है-
यस्तु सर्वाणिभूतानि आत्मन्येवाभूत विजानतः।
तत्र कः मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः।
वह लज्जमाणपुढोपास के आचार को धार कर ‘अप्पणो वहियापास’ का सार्थक व्यवहार कर पर्यावरणीय जगत् को सुरक्षित एवं संरक्षित कर संसार में सुख समृद्धि और साधुत्व का आलम फैलाता है। यदि पर्यावरण की सुरक्षा होनी है तो संस्कृति और संस्कृत-युवक से ही संभव है अन्यथा विध्वंस, विघटन और सुनामी हमारे इंतजार कर ही रहे है। संस्कृति सम्पन्न युवक, ऋतु और सत्य का भारतीय युवक व्यवहार और विशालता से साधित और सम्पन्न युवक रूप और मरणीयता का आधार युवक ही पर्यावरणीय संसर का मूल्य प्रतिष्ठापितकर सकता है।
वह पर्यावरण जगत् को कभी देव के रूप में तो कभी अपत्य स्नेह, सादर स्नेह तो कभी पारिवारिक भूमिका में धारण कर उसकी संरक्षा, सुरक्षा करता है, पर्यावरण जगत् को समृद्ध कर मानवीय संसार की रक्षा करता है। संस्कारित युवक न केवल अपना भरण-पोषण करता है, अपितु विश्व मानवता, जड़ चेतनात्मक जगत् को ही अपना परिवार मानकर राजरन्तिदेव की भूमिका में आकर सभी का दुःख अपने ऊपर लेकर संसार को केवल सुख का दान कर जाता है-‘आर्ति प्रपद्येऽखिल देहभाजाम्“ की ही याचना अपनी मन की भूमिका में कर बैठता है, तो कभी संसार की कटुता, विरसता रूप विष का पानकर स्वयं नीलकण्ठ बनकर विश्व को अमृत का दान देकर महादेव बन जाता है, तो कभी त्याग, तप, तपोवन तीन तकारों की सहायता और संबल से जगदम्बत्व के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है।
वह रूप का आकर और रमणीयता की खनिभूत युवक प्रकृति के हर पदार्थ में रूप रमणीयता लावण्य लालित्य का अभिषेक कर परमाहृाद रूप मोक्ष को प्राप्त करता है। उसका रोम-रोम इस संगीत की ध्वनि से गूंजित होता रहता है-
सर्वे भन्तु सुखिन सर्वेसन्तु वरमयाः
सर्वेभद्राणिपश्यन्तु मा कश्रिचत् दुःखभाग् भवेत।। भविष्यपुराण
वह कभी प्रकृति जगत् को, पर्यावरणीय संसार को देव मानता है। अग्नि, वायु, सूर्य, जल, वनस्पति वृक्ष, पृथिवी उषा आदि को देव रूप में अभिनन्दित एवं अभिवन्दित कर विश्वमंगल रूप पर्यावरण-धर्म की सुरक्षा, प्रतिष्ठा एवं विस्तार करता है। उन्हें माता-पिता के समान संरक्षक मानकर अपना पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित करता है। वैदिक मन्त्र प्रमाण है-
स नः पितेव सुनवेऽग्ने सुषायनो भव
स चस्वा नः स्वस्तये।। ऋग्वेद।।1.6।।
जड़जगत् किंवा पर्यावरण संसार के साथ अपत्यस्नेह स्थापित कर उन्हीं के साथ बैठकर उनके दुःख सुखका समभागी बनता है- वनान्त संगीत सखी दरोदयत्। (कुमार संमभम्) जब भगवती सीता का अपहरण कर रावल ले जा रहा था तो रोती विलखती सीता को पत्थर भी कहते हैं- हे माॅ मत रोवो मा भैषी। मा मा भेषी। कही पर लोक प्रसिद्ध अचेतन प्राणी को दूत बनाकर विश्व मंगल की साधना में तल्लीन रहता है, तो कभी प्रकृति के हर कण में अपने पूज्य के, प्रिय के रूप को निरखकर धन्य-धन्य हो जाता है-सियाराम मै सब जग जानी करा। प्रणाम जोरी जग पाणी।
वह भारतीय युवक अपने सौभाग्य शीलवान् रूप से न केवल भेज जगत् बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को आहृादित एवं प्रसन्न करता है। पर्यावरणीय संसार भी उनके रूप को निरखकर आहृादित होता है। कृष्ण के त्रिभुवन कमन रूप को निरखकर प्रसन्न होता है।
त्रैलोक्य सौभगमिदं निरिरीक्ष्य रूपं
यद् गोद्विजद्ुममृगा पुलकानि विभ्रन्।। (भागवतपुराण)
वह भारतीयता से अनुप्राणित युवक अपने आचरण से ‘समाना आकूति समाना हृदयानि वः’ से जगत् के छालछद्य को दूर कर सहृदयता की प्रतिष्ठा करता है तो कभी अप्पणों बहिया पास (अपने जैसा ही संसार को, देखो) जीवियं पियं (सबको जीवन प्रिय है) रूप प्राकृतमंत्रों को सिद्धकर ‘अहिंसा परमोधर्मः’ का अलख जगाता है।
अंततः हम बड़े श्रद्धा और सात्विक विश्वास के साथ कह सकते हैं कि संस्कार एवं भारतीयता के भाव से सम्पन्न युवक ही पर्यावरण जगत् की सुरक्षा संरक्षा कर सकता है। अन्यथा विखण्डना और वैमत्य की ‘पुतना’ हमारा इंतजार कर रही है। सुनामी प्रहार के लिए नजर गड़ाये बैठी है।