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मुद्दा: बड़े देशों की मनमानी से संकट में पर्यावरण, सम्मेलनों को एकाकी रूप से आयोजित कर औचित्यपूर्ण बनाना जरूरी

विवेक एस अग्रवाल
Updated Mon, 09 Dec 2024 06:48 AM IST

सार

पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए बाकू के बाद बुसान में हुई एक और संधिवार्ता बेनतीजा साबित हुई, जाे इनके औचित्य पर सवाल उठाती है।
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बड़े देशों की मनमानी से संकट में पर्यावरण (प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी


यह जानते हुए भी की यदि यही गति चलती रही, तो आगामी 25 वर्षों में अनुमानित रूप से प्लास्टिक का उत्पादन लगभग तीन गुना बढ़ जाएगा। बुसान में संपन्न प्लास्टिक संबंधी सम्मेलन में पनामा दल के प्रमुख ने तो यहां तक कहा कि संधि स्थगित करने से विभीषिका स्थगित नहीं होने वाली है और प्लास्टिक संधि के प्रत्येक दिन का विलंब मानवता के विरुद्ध एक दिन है। स्पष्ट है कि छोटे देश विशेषकर द्वीपीय देश प्लास्टिक के रहते किस कदर प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन तेल उत्पादक देश इस मानवीय संकट से अविचलित हो उत्पादन कम करने बाबत प्रस्ताव से असहमति जता रहे हैं यानी प्लास्टिक उनके लिए अभी भी चिंता का विषय नहीं है।


प्लास्टिक का विकराल स्वरूप अनियंत्रित रूप से जल, थल और नभ तीनों में विस्तारित हुए जा रहा है। प्लास्टिक संधिवार्ता से पूर्व यह माना जा रहा था कि यह निर्णायक होगी, लेकिन चंद देशों के द्वारा प्रस्तुत प्लास्टिक उत्पादन पर अंकुश नहीं लगाने संबंधी प्रारूप के चलते अधिसंख्य आबादी का प्रस्ताव भी स्वीकृत नहीं हो पाया। प्लास्टिक पर वैश्विक संधि को तार्किक एवं वैज्ञानिक संदर्भ देने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि इसमें प्रयुक्त होने वाले अवयवों विशेष तौर पर ऐसे विषैले रसायन, जिनसे सीधे मानव सभ्यता को खतरा उत्पन्न हो रहा है पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। लेकिन विगत वर्षों में इस बाबत हुई समस्त चर्चाओं और वार्ताओं के परिणाम में किसी एक बिंदु विशेष को लेकर संधिवार्ताएं भंग होने का इतिहास मिलता है।


इन दोनों सम्मेलनों की असफलता में एक समानता है, तो वह है अभी भी तेल उत्पादक देशों की प्रभुसत्ता। जलवायु सम्मेलन में भी मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन को बढ़ते तापमान के लिए दोषी माना गया था और उस पर अंकुश लगाने संबंधी प्रस्ताव रखे गए थे। उस पर सहमति, तो सभी की थी, लेकिन जीवाश्म ईंधन से हो रहे वातावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए तेल उत्पादक देश उपयुक्त रूप से योगदान के लिए सहमत नहीं थे। इसी प्रकार प्लास्टिक भी मूल रूप से तेल उत्पादन का एक उपउत्पाद है यानी उससे निकलने वाले पॉलीमर के द्वारा ही प्लास्टिक का निर्माण होता है। यदि प्लास्टिक पर अंकुश लगाना है, तो जीवाश्म ईंधन को कम करना होगा।


भारत समेत कई देशों द्वारा वैकल्पिक ऊर्जा के साधनों पर किए जा रहे निवेश दूरगामी प्रभाव के रूप में बेहतर वातावरण और प्लास्टिक मुक्त पृथ्वी की संकल्पना को मूर्तरूप देने में अहम कदम होंगे। लेकिन वैकल्पिक ईंधन के जो विकल्प तलाशे जा रहे हैं, उनकी विडंबना यह है कि वे भी किसी न किसी खनन स्रोत पर निर्भर हैं। वैकल्पिक ऊर्जा का व्यापक स्तर पर सृजन सौर अथवा वायु के माध्यम से किया जा सकता है। लेकिन, सौर ऊर्जा सृजन में भी जो साधन काम में लिए जाते हैं, उनके लिए प्रयुक्त खनिज पर कुछ देशों का आधिपत्य है। वायु जनित ऊर्जा एक सशक्त विकल्प है, किंतु यह संपूर्ण विश्व में समान रूप और वेग से उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार इलेक्ट्रिक परिवहन साधन में प्रयोग में ली जाने वाली लीथियम धातु का खनन भी कुछ देशों तक ही सीमित है। इन सब के रहते जीवाश्म ईंधन का प्रसंस्करण निरंतर चलता रहेगा और उससे उत्पन्न पॉलीमर प्लास्टिक भी पैदा करते रहेंगे। यानी की अर्थव्यवस्था के मूल में दोनों अपनी अहम भूमिका अदा करते रहेंगे, जो कि किसी भी रूप में सृष्टि के लिए उचित नहीं है।


यदि सम्मेलन इसी प्रकार वर्ष दर वर्ष परिणामविहीन संपन्न होते रहे, तो उनकी प्रासंगिकता पर भी प्रश्न लग जाएंगे और सम्मिलित प्रतिनिधियों के लिए यह अरुचिकर भी हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि बाकू में पचास हजार और बुसान में लगभग साढ़े तीन हजार लोग इकट्ठा हुए थे। 29 वर्षों से चल रहे जलवायु परिवर्तन एवं विगत तीन वर्षों से चल रही प्लास्टिक संधिवार्ता पर्यटन के साथ साजिशन भी प्रतीत होती है। अतः जलवायु एवं वातावरण संबंधी अनेकानेक सम्मेलनों को एकाकी रूप से आयोजित कर औचित्यपूर्ण बनाने की आवश्यकता है।
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