चार वर्षों में चार गुना से अधिक की यह वृद्धि पहली नजर में भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती क्षमता, उद्यमिता और निवेश-अनुकूल वातावरण का संकेत देती है। लेकिन, इस आंकड़े का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब अति समृद्ध लोगों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है, तब क्या देश के आम नागरिकों की आय, जीवन-स्तर और अवसरों में भी उसी अनुपात में सुधार हो रहा है?
यह स्वीकारने में कोई संदेह नहीं कि बड़े उद्योगपति और सफल उद्यमी रोजगार पैदा करते हैं, निवेश बढ़ाते हैं, नई तकनीक लाते हैं और सरकार के लिए कर राजस्व का बड़ा स्रोत भी बनते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में भी विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, रक्षा उत्पादन, बुनियादी ढांचे और सेवा क्षेत्र में जिस प्रकार का विस्तार हुआ है, उसने नए कारोबारी अवसर पैदा किए हैं। इसके अलावा, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, डिजिटल भुगतान व्यवस्था, जीएसटी और कारोबारी माहौल को सरल बनाने के ऐसे ही अन्य प्रयासों ने भी उद्योग जगत का विश्वास बढ़ाया है।
इसलिए, यह स्वाभाविक है कि बड़ी पूंजी वाले उद्यमियों की संख्या में बढ़ोतरी दिखाई दे। लेकिन, आर्थिक विकास सिर्फ इस बात से नहीं मापा जा सकता कि कितने नए अरबपति बने; अलबत्ता अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विकास का लाभ समाज के कितने बड़े हिस्से तक पहुंचा।
वैश्विक असमानता रिपोर्ट-2026 के अनुसार, भारत की सिर्फ एक फीसदी आबादी के पास कुल संपत्ति का 40 फीसदी हिस्सा है। आय के स्तर पर भी देखें, तो स्थिति गंभीर दिखती है, जहां देश की शीर्ष 10 फीसदी आबादी राष्ट्रीय आय का 58 फीसदी हिस्सा अर्जित करती है, वहीं नीचे का 50 फीसदी वर्ग महज 15 फीसदी आय पर निर्भर है।
सौ करोड़ रुपये से अधिक कमाने वाले कारोबारियों की संख्या का बढ़ना बेशक एक उपलब्धि है, लेकिन किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक सफलता अवसरों के न्यायपूर्ण वितरण में निहित होती है। ऐसे में, यह जरूरी है कि समृद्धि कुछ हाथों तक सीमित न रहकर कमजोर व वंचित वर्गों के जीवन में भी ठोस बदलाव लाए।