वर्ष 2018-19 में कृषि में श्रमिकों की संख्या 18.8 करोड़ यानी कुल कार्यबल का 42.5 फीसदी थी। वर्ष 2004-05 (49 प्रतिशत) के बाद से इसमें नियमित रूप से गिरावट आ रही थी। अचानक कोविड लॉकडाउन के कारण रिवर्स माइग्रेशन से यह हिस्सा 2020 में बढ़कर 45.6 प्रतिशत हो गया। और 2021 में फिर से बढ़कर कुल कार्यबल का 46.5 फीसदी हो गया। भारत की समृद्धि की खातिर संरचनात्मक परिवर्तन के लिए श्रमिकों को कृषि क्षेत्र से बाहर ले जाना बेहद जरूरी है।
वर्ष 2004-05 से कृषि में श्रमिकों की हिस्सेदारी नियमित रूप से गिरना वास्तव में ग्रामीण आय के लिए अच्छा था, क्योंकि अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अतिरिक्त श्रमिक कृषि पर निर्भर हैं। निर्माण, उद्योग और सेवा क्षेत्र के श्रमिक, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में उच्च मजदूरी अर्जित करते हैं, क्योंकि कृषि की तुलना में उनमें उत्पादकता अधिक होती है। यह संरचनात्मक परिवर्तन एक विकसित देश बनने की विशेषता है। स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में पहली बार कृषि में 2004-5 से कामगारों की संख्या कम होनी शुरू हुई थी, जो प्रत्याशित थी। यह प्रक्रिया 15 वर्षों यानी 2019 तक जारी रही। परंतु कृषि की ओर पुनः पलायन से कृषि में श्रमिकों की संख्या में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई-न केवल 2020 में, बल्कि 2021 में भी वृद्धि जारी रही।
आखिर कृषि श्रमिक कर क्या रहे हैं? वर्ष 2011-12 में 34.7 फीसदी कृषि श्रमिक स्वयं किसान थे; वह हिस्सा 2020-21 तक बढ़कर 42.5 फीसदी हो गया। ये शायद पहले के काश्तकार थे, जिनके पास जमीन थी, और उन्हें खेती में वापस जाना पड़ा, भले ही खेती उनकी पहली प्राथमिकता नहीं है। उनमें से अधिकांश निर्माण क्षेत्र में काम करने के लिए दूसरे राज्यों या शहरों में चले गए थे, जहां रोजगार और मजदूरी अधिक है। हालांकि लॉकडाउन के दौरान काम बंद होने और निर्माण कार्य की धीमी गति ने श्रमिकों को फिर शहरों में वापस नहीं खींचा है।
ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि जब घर के पुरुष गैर-कृषि कार्य के लिए चले गए थे, तब भूमि परती पड़ी हुई थी। जब वे वापस गांव में लौटे, तो फिर से खेती में जुट गए। यही कारण है कि 2018-19 और 2019-20 के बीच अवैतनिक पारिवारिक श्रम में 4.7 से 6.8 करोड़ तक बहुत तेजी से वृद्धि हुई है, और 2020-21 में विशेष रूप से और वृद्धि हुई है, लेकिन केवल महिलाओं के बीच नहीं। यह एक विशेष ग्रामीण घटना रही है।
महिलाएं, जो बड़ी संख्या में वर्ष 2017 से पहले कृषि छोड़ रही थीं (ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रमबल की भागीदारी घट रही थी), वर्ष 2018 से फिर से कार्यबल में शामिल होना शुरू हुईं, लेकिन अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक के रूप में। इस प्रकार, 2016 से गिरती जीडीपी वृद्धि के समय सरकारी एनएसओ, पीएलएफएस आंकड़ों के मुताबिक, कुल मिलाकर श्रम और कार्यबल भागीदारी दर (डब्ल्यूपीआर) में वृद्धि, और बेरोजगारी दर में गिरावट दिखा रहा था। सकल घरेलू उत्पाद की धीमी वृद्धि के कारण यह अतुलनीय प्रतीत हो सकता है, लेकिन इस पहेली को हल किया जा सकता है।
एक तो इससे यह पता चलता है कि जहां नियमित वैतनिक कार्य और आकस्मिक वेतन (दिहाड़ी) कार्य का हिस्सा गिर रहा है, वहीं स्व-रोजगार बढ़ रहा है। स्व-रोजगार के भीतर सबसे बड़ी वृद्धि अवैतनिक पारिवारिक श्रम के कारण है, जो रोजगार का सबसे खराब रूप है। अवैतनिक पारिवारिक श्रम में वृद्धि यह आभास देती है कि रोजगार बढ़ रहा है, बेरोजगारी गिर रही है। लेकिन यह निष्कर्ष पूरी तरह से भ्रामक है। वास्तव में रोजगार बढ़ना चाहिए, और बेरोजगारी घटनी चाहिए। अगर अर्थव्यवस्था फल-फूल रही है और रोजगार पैदा कर रही है, तो श्रमिकों को श्रम बाजार में खींचा जाता है। लेकिन जब निर्यात में गिरावट के समय रोजगार बढ़ता दिख रहा है, जबकि जीडीपी अनुपात में गिरावट है, तो सवाल उठने चाहिए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सीएमआईई का रोजगार आंकड़ा दिखाता है कि 2016 के बाद से रोजगार घट रहे हैं और बेरोजगारी दर में वृद्धि हुई है, जबकि पीएलएफएस का दावा है कि रोजगार बढ़ रहे हैं और बेरोजगारी कम हो रही है। दोनों का आंकड़ा एक दूसरे के विपरीत है, जो दर्शाता है कि सीएमआईई 'अवैतनिक पारिवारिक श्रम' को रोजगार नहीं मानता है।
वर्ष 2020 के मध्य में जब कोरोना महामारी के कारण रिवर्स पलायन शुरू हुआ, तो ग्रामीण क्षेत्रों में पहले ही बेरोजगारों का भंडार था। बेरोजगारों की संख्या 2011-12 के एक करोड़ से बढ़कर 2019 तक तीन करोड़ हो गई थी। अचानक लॉकडाउन के कारण लाखों प्रवासी श्रमिकों के गांव लौट आने से यह संख्या और बढ़ गई। वर्ष 2020 कृषि श्रमिकों की संख्या 4.5 करोड़ थी, जिसमें 2021 में 70 लाख की अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई थी। इसके चलते आकस्मिक वेतनभोगी श्रमिकों में नाटकीय वृद्धि हुई। दूसरे शब्दों में, कृषि मजदूरी दरों में गिरावट से ग्रामीण संकट तेजी से बढ़ा।
कृषि पर निर्भर अतिरिक्त श्रम की यह स्थिति, जिसकी संख्या 2020 के बाद से काफी बढ़ गई है, बदलनी चाहिए। तभी कृषि क्षेत्र में आय तेजी से बढ़ सकती है। इसके लिए उद्योग और आधुनिक सेवाओं में गैर-कृषि नौकरियों को तेजी से बढ़ाने की जरूरत होगी। इसके लिए अल्पावधि और दीर्घकालीन, दोनों तरह की नीतियां अपनाने की जरूरत है। अल्पावधि में, मनरेगा निधियों को पर्याप्त करने की आवश्यकता है, ताकि कृषि क्षेत्र में गिरती मजदूरी के कारण ग्रामीण आय संकट को दूर किया जा सके। दीर्घकालीन नीतियों में, बुनियादी ढांचे के निर्माण, निर्माण उद्योग और आधुनिक सेवाओं में गैर-कृषि रोजगार सृजन पर नए सिरे से ध्यान देने की जरूरत है।
-लेखक, बाथ यूनिवर्सिटी, यूके में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।