पिछले दिनों सरकार ने कर संबंधी कानून के उन क्षेत्रों को चिह्नित करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है, जिसमें स्पष्टता एवं सुधार की जरूरत है। साफ है कि सरकार करदाताओं के बीच विश्वास बहाल करना चाहती है। दरअसल एनडीए सरकार ने इस वर्ष अपना जो पहला बजट पेश किया, उसमें अगले पांच वर्षों के लिए सरकार के आर्थिक एजेंडे के रोडमैप का अभाव था। पिछली सरकार की तरह इस सरकार ने भी कर नीति पर तात्कालिक रवैया अपनाया और नई योजनाओं की एक लंबी सूची पेश कर उनके लिए थोड़ी-थोड़ी राशि आवंटित की। जबकि निवेश, विकास और राजस्व बढ़ाने के लिए एक व्यापक कर सुधार संबंधी रणनीति की जरूरत है।
मेरा सुझाव है कि वित्त मंत्री को केंद्रीय कर-जीडीपी अनुपात को 2018-19 तक बढ़ाकर 12 फीसदी करना चाहिए, जो अभी 10 फीसदी है। इसके अलावा सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि कारोबार करने के लिहाज से 2018 तक भारत कम से कम 50वें स्थान पर पहुंच जाए। अभी 189 देशों की वैश्विक रैंकिंग में भारत 158वें स्थान पर है।
इसमें दो राय नहीं कि पिछला बजट पेश करते समय वित्त मंत्री के सामने संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती थी। एक तरफ राजकोषीय घाटा कम करने के लिए उन्हें राजस्व में वृद्धि करनी थी, तो दूसरी तरफ कर संबंधी निवेश माहौल में सुधार का प्रयास करना था। बेशक एनडीए सरकार ने निवेशकों के अनुकूल और विकास को गति देने वाली स्थिर एवं पूर्वानुमानित कर व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता जताई है, जो एक सराहनीय लक्ष्य है, लेकिन इसके लिए उचित कर नीति संबंधी पहल नहीं की गई है। सभी जानते हैं कि राजस्व बढ़ाने के लिए कर मोर्चे पर की जाने वाली पहलकदमी का निवेश एवं विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। मसलन, उच्च कॉरपोरेट टैक्स का निवेश पर बहुत बुरा असर पड़ता है, जबकि अप्रत्यक्ष कर, जैसे कि मूल्यवर्धित कर यानी वैट ज्यादा अनुकूल होता है। कर नीति में सुधार मुख्यतः कर दायरे को व्यापक बनाने वाला, दर को कम करने वाला, कर कानून की जटिलताओं को घटाने वाला तथा कर ढांचे को सरलीकृत करने वाला होना चाहिए।
पिछले बजट में कर कानून को इस दिशा में मोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया गया। यूपीए सरकार में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 2013-14 के बजट में कॉरपोरेट लाभ पर 10 फीसदी शुल्क लगा दिया था, जिसने निवेश को हतोत्साहित किया। मौजूदा सरकार ने उसे जारी रखा है। अव्यवस्था कम करने की कोशिश के बजाय जहां कुछ खास उद्योगों में निवेश से संबंधित छूट जैसे कुछ अस्थायी प्रावधान किए गए, वहीं सीमा शुल्क में कुछ मामूली फेरबदल किए गए। लेकिन बजट में सबसे बड़ी कमी यह थी कि कर छूट और कर रियायतों को खत्म कर, जो राजस्व की कमी का सबसे बड़ा कारण है, कर दायरे को व्यापक बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई।
वित्त मंत्रालय द्वारा बजट में पेश दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2013-14 में विभिन्न कर छूट/कॉरपोरेट कर कटौती के चलते अनुमानतः 76,116 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का अनुमान लगाया गया था। इसके अलावा गैर-कॉरपोरेट क्षेत्र में 7,120 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का अनुमान लगाया गया। इस तरह से कुल राशि 83,000 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। अप्रत्यक्ष कर के मामले में तो घाटे का यह आंकड़ा और भी स्तब्धकारी है-उसी वर्ष केंद्रीय उत्पाद शुल्क में यह घाटा 1,95,679 करोड़ रुपये और सीमा शुल्क में 2,60,714 करोड़ रुपये था। कुल मिलाकर यह 5,39,629 करोड़ रुपये की विशाल रकम थी। अब उसी वर्ष के राजस्व घाटे, जो 3,70,288 करोड़ रुपये थी, के संदर्भ में इसे रखें, तो कुल वित्तीय घाटा 5,24,539 करोड़ रुपये होता है। यानी कुल राजस्व घाटा केंद्रीय बजट के पूरे वित्तीय घाटे से भी अधिक है। गौरतलब है कि इसमें व्यक्तिगत करदाताओं को दी गई कर छूट को नहीं जोड़ा गया, जो 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है।
ऐसा नहीं कि सभी कर छूट गलत हैं, लेकिन कर उगाही के यहां पर्याप्त अवसर हैं। कर में छूट उद्योग जगत को निवेश बढ़ाने, रोजगार पैदा करने, विकास में गति लाने या अन्य समाजोपयोगी गतिविधियों, जैसे पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए दी जाती है। इसलिए सरकार को इसकी समीक्षा करने की जरूरत है कि जिन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ये कर रियायतें दी गईं, वे पूरी हुईं या नहीं। यह भी देखना चाहिए कि क्या कर रियायत निवेश बढ़ाने में सफल रही? अगर हां, तो किसी खास रियायत से कितना निवेश सृजित हुआ? क्या कर रियायत रोजगार पैदा करने में सफल हुई, अगर हां, तो राष्ट्रीय स्तर पर कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए? कर रियायत से जितना निवेश और रोजगार पैदा हुआ, क्या वह रियायत के तौर पर छोड़ दिए गए राजस्व की तुलना में अधिक है? इस तरह का विश्लेषण तब तो और महत्वपूर्ण है, जब राष्ट्रीय बजट पर भारी दबाव है और राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में लाना एक बड़ी चुनौती। लेकिन कर रियायत पर ऐसे विश्लेषण की कोशिश शुरू नहीं हुई है।
मुख्य बात यह है कि अनावश्यक कर रियायत को खत्म करके राजकोषीय घाटे को कम किया जा सकता है। सरकार चरणबद्ध तरीके से कॉरपोरेट कर की दर में कमी ला सकती है और इसे मौजूदा 33 फीसदी से 30 या 28 फीसदी पर लाया जा सकता है।
जहां तक जीएसटी की बात है, तो अरुण जेटली ने राज्य सरकारों को भरोसे में लेने की शुरुआत की है। मगर राज्यों की सहमति के अलावा केंद्र को और पहल करनी चाहिए। छोटे एवं मंझोले उद्योगों के लिए भी कर व्यवस्था में काफी कुछ करने की जरूरत है। कर कानूनों को सरल बनाना आवश्यक है, ताकि शिकायत के बोझ को कम किया जा सके और छोटे एवं मंझोले उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा सके।
(विश्व बैंक से जुड़े वरिष्ठ कर नीति एवं राजस्व प्रशासन विशेषज्ञ)