फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रोजगार पर हावी चुनावी राजनीति

Fri, 07 Jun 2013 10:08 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
विज्ञापन
विज्ञापन
रोजगार के मोर्चे पर देश में इन दिनों दो तरह की धाराएं चल रही हैं। एक तरफ निजी क्षेत्र है, जो चालीस से ज्यादा की उम्र के लोगों से परहेज करने की नीति पर चल रहा है।
विज्ञापन


दूसरी ओर सरकारी क्षेत्र है, जो पुराने कर्मचारियों पर ही भरोसा जता रहा है। रिटायरमेंट की उम्र साठ से बासठ किए जाने के सरकारी प्रस्ताव को सिर्फ सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक दबावों को दो साल तक टालने की नीति के तौर पर ही देखा जा रहा है।

रोजगार के मोर्चे पर निजी और सरकारी क्षेत्र का जो रवैया है, उसका भारत के विकास की रफ्तार में आए ब्रेक से सीधा रिश्ता है। लेकिन सत्ता तंत्र का सौभाग्य कहें या विपक्षी खेमे का दुर्भाग्य, कि इस रिश्ते के आलोक में रोजगार, विकास और रिटायरमेंट की उम्र को देखा ही नहीं जा रहा।
विज्ञापन


रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के फैसले से जहां केंद्रीय सत्ता पर काबिज यूपीए को फायदा होता नजर आ रहा है, वहीं विपक्ष यह समझ ही नहीं पा रहा कि इन नीतियों का खुलकर विरोध किया जाए या समर्थन।

वर्ष 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में सरकारी क्षेत्र के 18 करोड़ 70 लाख कर्मचारी हैं। इनमें केंद्र सरकार के सिर्फ 30 लाख 99 हजार कर्मचारी हैं।

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने की जो कवायद कर रही है, उससे करीब डेढ़ लाख सरकारी कर्मचारियों को फायदा होगा। उन्हें पेंशन, ग्रेच्युटी और दूसरे मदों में देने वाले करीब पांच हजार करोड़ रुपये बच जाएंगे।

वर्ष 1998 में केंद्र सरकार की नौकरियों में रिटायर होने की उम्र 58 साल से बढ़ाकर जब साठ साल की गई थी, तब भी सरकार को फौरी तौर पर 5,200 करोड़ के भुगतान से मुक्ति मिल गई थी। रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के फैसले का सबसे बड़ा फायदा यह है कि केंद्र सरकार के करीब पचहत्तर फीसदी कर्मचारी दिल्ली या उसके आसपास नौकरी में हैं।

भ्रष्टाचार और महंगाई से लोग जिस तरह त्रस्त हैं, उसमें दिल्ली की शीला सरकार की वापसी मुश्किल मानी जा रही है। ऐसे में केंद्र सरकार की नौकरियों में रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फायदा शीला सरकार को मिल सकता है।
लेकिन मामला इतना भर नहीं है।

इस फैसले के बाद राज्य सरकारों पर भी उनके कर्मचारी संगठन अवकाश ग्रहण की उम्र सीमा बढ़ाने का दबाव बनाएंगे। दबाव में राज्य सरकारों को भी वैसे ही उम्र सीमा बढ़ानी पड़ सकती है, जैसे छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट केंद्र की तर्ज पर लागू करनी पड़ी।

कहना गलत नहीं कि छठे वेतन आयोग को लागू करने के कारण भी आज महंगाई बेलगाम हुई है। इससे राज्यों के योजनागत पैसे का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन पर ही खर्च हो रहा है। नतीजतन राज्यों की तरफ से किए जाने वाले विकास कार्य कम हुए हैं।

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का तर्क रहता है कि राज्य और केंद्र सरकार लोकप्रिय आर्थिक फैसले न लें, लेकिन रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के फैसले को क्या लोकप्रिय आर्थिक फैसला नहीं माना जा सकता?

निजी क्षेत्र में जवान खून पर भरोसा बढ़ा है। निजी क्षेत्र कम वेतन में कम उम्र वाले लोगों को रोजगार देकर आर्थिक फायदा तो उठा रहा है।

लेकिन देश में इस तरह से जो बेरोजगारी बढ़ रही है, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। अपने देश में चूंकि पश्चिम की तरह सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान नहीं हैं, इसलिए सरकार की ऐसे लोगों के प्रति सीधी जवाबदेही नहीं बनती। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि रोजगार के मोर्चे पर सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों के लिए एक ही तरह की नीति होती और उसे लेकर एक ही तरह के प्रावधान तय किए जाते।

इससे देश के विकास की गति एक साथ आगे बढ़ती। अगर रिटायरमेंट की उम्र नहीं बढ़ाई जाएगी, तो बेरोजगारी में एक सीमा तक ही सही, कमी आएगी। फायदा उसमें भी सरकार और उसे चलाने वाली पार्टी को हो सकता है। यानी रोजगार हासिल करने वाले नए रंगरूटों का उसे समर्थन मिल सकता है। इससे विकास की गति को नई राह भी मिल सकती है। लेकिन दुर्भाग्यवश इस तरफ सरकार का ध्यान नहीं है।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें