करिश्माई नेता अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से अलग हो जाने के बाद से ही भाजपा के शीर्ष नेताओं के बीच सत्ता संघर्ष गहराता गया है।
भाजपा हालांकि इसे स्वीकार नहीं करती, लेकिन पार्टी के चुनींदा नेताओं के बीच के रिश्ते सब कुछ बता देते हैं। भाजपा की मौजूदा दयनीय स्थिति के लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराना आसान है, पर असल समस्या तो भाजपा के भीतर है, क्योंकि उससे जुड़े सभी अहम फैसले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लेता है।
सिर्फ अटल जी अपवाद थे, जो किसी गुट के अंकुश में नहीं थे, बल्कि पार्टी की सीमाओं से ऊपर उठकर उन्होंने सरकार भी चलाई। मुझे नहीं लगता कि भाजपा अंदरूनी मतभेदों को दूर कर पाएगी, क्योंकि फिलहाल उसमें कई शक्ति केंद्र हैं।
लालकृष्ण आडवाणी नौसिखुआ नेता नहीं हैं। वह जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है। नरेंद्र मोदी और दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्री भी सच्चाई से वाकिफ हैं।
चूंकि वर्चस्व की लड़ाई में पार्टी के अन्य मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता झुकने वाले नहीं हैं, ऐसे में संभावित संकट से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखता।
नरेंद्र मोदी को सबसे कद्दावर बताया जा रहा है, पर हिमाचल प्रदेश एवं कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव दिखना अभी बाकी है। भाजपा एक तरह से क्षेत्रीय पार्टी बन गई है।
उसे 2004 के रुझान को नहीं भूलना चाहिए, जब गुजरात दंगे से आहत अटल बिहारी वाजपेयी के पांच दशक लंबे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा उलटफेर हुआ। बेशक यह अतीत की बात है, पर भाजपा के प्रति अल्पसंख्यकों की धारणा अब भी नकारात्मक है।
आडवाणी ने इसी समय शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी से बेहतर क्यों कहा, यह समझना बेशक मुश्किल है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि पार्टी के भीतर संघर्ष जारी है। गुजरात उपचुनावों में लोकसभा की दो और विधानसभा की चार सीटें जीतने वाले नरेंद्र मोदी का हौसला अभी बुलंद है।
लेकिन यह राहत थोड़े समय के लिए है, क्योंकि पार्टी का अंदरूनी संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है और यह गोवा में हो रही कार्यकारिणी की बैठक के बाद भी जारी रहेगा। मेरा आकलन यह है कि अप्रैल, 2014 से पहले ही नरेंद्र मोदी इस संघर्ष में विजेता बनकर उभरेंगे।
अन्य उपचुनावों के नतीजे बताते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जनाधार घटा है। महाराजगंज की सीट राजद ने तो बचाई ही, महत्वपूर्ण यह कि उसने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। हाल की उसकी जनसभाओं में भी दोगुनी भीड़ देखी गई थी।
जाहिर है, लालू यादव आगामी लोकसभा चुनाव में चार से ज्यादा सीटें जीतेंगे। जदयू और नीतीश कुमार इस हार का ठीकरा भाजपा पर फोड़ सकते हैं, जबकि भाजपा जवाबी हमला कर सकती है, लेकिन ऐसे में दोनों अपनी चमक खो देंगे।
राजद ने कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और परस्पर लेन-देन के आधार पर यदि दोनों के बीच गठबंधन होता है, तो वे 10 से 15 सीटें जीत सकते हैं। यह गठबंधन बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है।
हावड़ा लोकसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस ने करीब 27,000 के मामूली अंतर से जीत हासिल की है, जबकि इसी लोकसभा क्षेत्र की सातों विधानसभा सीटों पर उसने एक लाख से अधिक अंतर से जीत दर्ज की थी।
जाहिर है, माकपा ने थोड़े ही समय में अपनी खोई जमीन जिस तरह हासिल की है, उसका नुकसान तृणमूल को उठाना पड़ेगा। कांग्रेस को वहां पर 95,000 मत मिले, जबकि भाजपा का कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं था। स्पष्ट है कि तृणमूल और भाजपा में समझौता हो गया था।
बेशक तृणमूल के जनाधार घटने के के कई कारण गिनाए जा सकते हैं, पर सच्चाई यही है कि ममता बनर्जी दबाव में हैं। भाजपा से समझौते की वजह से वह अल्पसंख्यकों के बीच जनाधार खो सकती हैं। इसका असर उस पंचायत चुनाव में दिख सकता है, जिसे तृणमूल स्थगित करने की कोशिश कर रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल के अजेय दुर्ग में अब दरार दिखने लगी है। उसकी जीत और हार के बीच केवल एक फीसदी का अंतर है!
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। हालांकि चैंपियंस ट्रॉफी में भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी समेत उनके सभी दोस्तों एवं सहयोगियों को बेहतर प्रदर्शन करते देखकर अच्छा लगता है। धोनी की अचानक संपन्नता ने उन्हें मीडिया के निशाने पर ला दिया है, क्योंकि वह इसके बारे में जानना चाहता है।
हमारे सामने तूफान से पहले जैसी खामोशी है, क्योंकि बीसीसीआई की चेन्नई में हुई बैठक की विफलता जवाब से अधिक सवाल खड़े करती है।
ऐसा लगता है कि कुछ सक्रिय राजनेता आईपीएल एवं बीसीसीआई के अपने आकर्षक पद छोड़ने के बजाय अपना राजनीतिक भविष्य स्थगित कर अधिक खुश होंगे। दिल्ली पुलिस ने राज कुंद्रा से 12 घंटे पूछताछ की है और राजस्थान रॉयल्स जांच के दायरे में है। एक बार फिर चेन्नई का होटल मालिक विक्रम अग्रवाल गायब है।
धीरे-धीरे ही सही, पर फिक्सिंग का फंदा कइयों पर कस रहा है। हमारे देश में खेल जगत से भ्रष्टाचार को खत्म करने की जिम्मेदारी खेल मंत्रालय एवं सरकार पर है, क्योंकि कोई भी खेल में अपने एकाधिकार को छोड़ना नहीं चाहता। प्रधानमंत्री ने संकेत किया है कि खेल एवं राजनीति को एक साथ नहीं मिलाना चाहिए। अपने इरादे को कार्यरूप देने का यही वक्त है, क्योंकि चीजें नियंत्रण से बाहर चली गई हैं।