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रेवड़ी राजनीतिः राजकीय खर्चे पर चुनावी बीमा, बस समय, संदर्भ और सामग्री बदलते रहते हैं..

शंकर अय्यर
Updated Wed, 03 Aug 2022 05:40 PM IST

सार

चुनाव आयोग या वित्त आयोग द्वारा राज्यों को योजनाओं पर द्वि-वार्षिक परिणाम रिपोर्ट प्रकाशित करने का निर्देश दिया जा सकता है। इससे ऑडिट की विश्वसनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ेगी। इन सब के लिए मतदाताओं की ओर से निरंतर जुड़ाव और सतर्कता की आवश्यकता है।
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vote new - फोटो : i stock

पिछले हफ्ते राजनीतिक नैतिकता का एक पुराना सवाल राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में फिर से उभरा। वर्ष 2006 में एस. सुब्रमण्यम बालाजी ने चुनाव से पहले टेलीविजन सेट जैसे मुफ्त उपहारों के वादे के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया था। वह याचिका खारिज कर दी गई, तो बालाजी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निष्पादन करते हुए कहा कि मुफ्तखोरी सभी लोगों को प्रभावित करती है और 'स्वतंत्र व निष्पक्ष मतदान की जड़ को काफी हद तक झटका देती है।' 


सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के परामर्श से आदर्श आचार संहिता तैयार करने का निर्देश दिया। फलतः नई आदर्श आचार संहिता अप्रैल, 2015 में सामने आई। लेकिन चुनावों में मुफ्त रेवड़ियां बाटंने की परंपरा अब भी जारी है। लगभग एक दशक बाद इस हफ्ते मुफ्त उपहारों को नियंत्रित करने के लिए फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। इस बार सुप्रीम कोर्ट में अश्वनी उपाध्याय द्वारा याचिका डाली गई, जो वकील और भाजपा सदस्य हैं, जिसने खुद भी चुनावों से पहले मुफ्त उपहार बांटने का वादा किया है। 


उपाध्याय ने तर्क दिया कि मुफ्त उपहारों का वितरण रिश्वत है। कोर्ट ने केंद्र से वित्त आयोग से परामर्श करने के लिए कहा कि क्या चुनाव के दौरान 'असंगत मुफ्त उपहारों' के वादे पर अंकुश लगाया जा सकता है। इस निर्देश का समय, संदर्भ और सामग्री राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। महज एक हफ्ते पहले प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के जालौन में एक बैठक में राजनीति में 'रेवड़ी संस्कृति' के खिलाफ तीखा हमला बोला था। जाहिर तौर पर इसने बयानबाजी और नारों की झड़ी लगा दी। 


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूछा कि क्या लोगों को मुफ्त में बिजली या स्कूल में शिक्षा देना रेवड़ी बांटना है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पूछा कि क्या रेवड़ी शब्द संसदीय है, और कहा कि जो लोग धन्यवाद के रूप में रेवड़ी बांटते हैं, उन्हें इसके बजाय युवाओं को रोजगार देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश ने राजनीतिक नैतिकता पर एक उग्र बहस को जन्म दिया है और कई व्यावहारिक एवं दार्शनिक प्रश्नों को जन्म दिया है। 


तमिलनाडु के वित्तमंत्री पी. त्यागराजन ने पूछा कि कौन यह तय करेगा कि कौन-सी चीज आवश्यक सेवा के बजाय मुफ्त की रेवड़ी है, कौन यह तय करेगा कि क्या असंगत है और क्या भारत का संविधान न्यायपालिका को मतदाताओं का संरक्षक मानता है या उससे सिर्फ वोट का रिश्ता है? मुफ्त रेवड़ी (फ्रीबी) का मुहावरा 1920 के दशक की अमेरिकी राजनीति से निकला है। रेवड़ी बांटने की राजनीति एक प्रभावी चुनावी बीमा है, जिसका भुगतान करदाताओं के पैसे से किया जाता है। 


बुनियादी सवाल यह है कि मुफ्त की रेवड़ी का भुगतान किसके पैसों से हो रहा है और वादों की झड़ी का फायदा किसे हो रहा है। मुफ्त की रेवड़ी की परिभाषा अपने आप में बहस का विषय है। इतिहास बताता है कि जिसे आज मुफ्त का उपहार कहा जाता है, वह कुछ वर्षों बाद किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम का हिस्सा बनकर अधिकार बन जाता है। के. कामराज द्वारा शुरू की गई और 1982 में एमजी रामचंद्रन द्वारा विस्तारित की गई मध्याह्न भोजन योजना का पहले दिल्ली ने मजाक उड़ाया था, लेकिन एक दशक बाद उसे राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में अपना लिया गया। 
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एन. टी. रामाराव का दो रुपये प्रति किलो चावल का वादा वर्तमान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का मूल अवतार है। तेलंगाना के 'रायतु बंधु' और ओडिशा के 'कालिया' प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अग्रदूत थे। तमिलनाडु में शुरू की गई मुफ्त दवा योजना एक राष्ट्रीय योजना का मसौदा है। हालांकि हर मुफ्त उपहार आदर्श नहीं होता है। मुफ्त उपहार के विनाशकारी होने का एक ज्वलंत उदाहरण 1990 के दशक में अकाली दल द्वारा शुरू की गई मुफ्त बिजली व्यवस्था है। 


मुक्त बिजली व्यवस्था भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा के लिए एक जीवंत खतरा है। जितनी बिजली वितरित की जाती है, उसके पांचवें हिस्से का कोई राजस्व नहीं वसूला जाता है और राज्य बिजली कंपनियों को सालाना 75,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है-उनमें से 28 कंपनियां घाटे में चल रही हैं और उन पर 1.09 साथ लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। लोगों को परेशान करने वाले मुद्दों को हल करने में असमर्थ होने के कारण राजनीतिक वर्ग रॉबिनहुड राजनीति और फ्लाईओवर अर्थशास्त्र पर निर्भर होते हैं, ताकि परिणामों से निपट सकें, भले ही वे अनुपयोगी हों। 


मसलन, मनरेगा की मांग में वृद्धि रोजगार सृजन के लिए माहौल सुधारने में राज्यों की विफलता को दर्शाती है। बुनियादी सेवाओं के वितरण में खामियों और पुलिस, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में खाली पदों को देखते हुए राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त उपहार देने में आवश्यक कटौती को लेकर विवाद नहीं हो सकता। आखिर रियायतों की कीमत राज्य सरकारों के खजानों को खाली करके पूरी हो रही है। यह सच है कि राज्यों को नए कार्यक्रमों को शामिल करने का अधिकार है। 


पर यह खुला खेल नहीं हो सकता है और सार्वजनिक उद्देश्य के साथ करदाताओं के पैसे के खर्च में तालमेल बिठाने की आवश्यकता होती है। चुनावी वादों के लिए मानदंड तय करने और उसकी योजना, क्रियान्वयन और जवाबदेही में खामियों को ठीक करने की तत्काल आवश्यकता है। इसकी शुरुआत वहीं से होनी चाहिए, जहां से वादे किए जाते हैं। चुनाव आयोग यह निर्देश दे सकता है कि घोषणापत्र मतदाताओं को सूचित करे कि किस समस्या का समाधान किया जा रहा है, करदाताओं पर इसका कितना बोझ पड़ेगा और अतिरिक्त धन कहां से आएगा। 


यह सूचना मतदाताओं को विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगा। राज्यों की बैलेंस शीट की रक्षा के लिए वित्त आयोग एफआरबीएम अधिनियम के माध्यम से नई और लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च को सीमित करने के लिए एक तंत्र बना सकता है। इसे कम से कम यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं की उपेक्षा न हो और धन की कमी न हो। चुनाव आयोग या वित्त आयोग द्वारा राज्यों को योजनाओं पर द्वि-वार्षिक परिणाम रिपोर्ट प्रकाशित करने का निर्देश दिया जा सकता है। इससे ऑडिट की विश्वसनीयता और सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ेगी। इन सब के लिए मतदाताओं की ओर से निरंतर जुड़ाव और सतर्कता की आवश्यकता है। आखिरकार, लोकतंत्र में मुफ्त उपहारों को अवरुद्ध करने या अनुमति देने की शक्ति मतदाताओं के पास ही होती है।

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