बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश-इन छह राज्यों की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा ने चार सीटों पर अपनी जीत दर्ज कराके यह प्रदर्शित कर दिया है कि जिन राज्यों में वह सत्ता में नहीं है, वहां भी उसने उपचुनाव में अपना दमखम बनाए रखा है। बिहार, हरियाणा, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश-इन सभी राज्यों में उपचुनाव में भाजपा ने एक-एक सीट जीती है।
बिहार में एक सीट राजद को, तो एक सीट भाजपा को मिली है। वहीं हरियाणा में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पोते भव्य विश्नोई आदमपुर में भाजपा के प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित घोषित किए गए। यानी कांग्रेस को एक और झटका लगा है। महाराष्ट्र में अंधेरी ईस्ट सीट पर उद्धव ठाकरे से जुड़ी शिवसेना प्रत्याशी ऋतुजा लटके चुनाव जीत गई हैं।
ओडिशा के धामनगर में भाजपा की जीत अप्रत्याशित मानी जाती है, क्योंकि वहां क्षेत्रीय पार्टी बीजद अब भी प्रभावशाली है। उत्तर प्रदेश के गोला गोकर्णनाथ में भाजपा चौंतीस हजार से ज्यादा मतों के अंतर से चुनाव जीत गई। ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहा है, लेकिन उसे अब भी सबसे कड़ी चुनौती क्षेत्रीय दलों से मिल रही है, न कि कांग्रेस से।
अब जो महत्वपूर्ण चुनाव है, वह है गुजरात का विधानसभा चुनाव, जो भाजपा एवं विपक्ष, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। एक तरफ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव की कमान है और भाजपा का दूसरे दशक में शासन का फिर से दावा है, तो दूसरी ओर विपक्ष में कमजोर कांग्रेस पार्टी है। यह स्पष्ट नहीं दिखता कि राज्य के चुनावी समर का नेतृत्व शक्तिसिंह गोहिल के हाथ में है या परेश धनानी के।
राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर तो हैं, पर गुजरात में 'भाजपा तोड़ो' की मुहिम किसके हाथ में है, यह स्पष्ट नहीं है। पिछली बार तो विरोध के बहुत से मुद्दे थे। सूरत में जीएसटी पर रोष था। जिग्नेश, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर की तिकड़ी थी और यह माना जाता था कि ग्रामीण इलाकों एवं पाटीदारों में भाजपा के खिलाफ खासा रोष था। इस बार ग्रामीण इलाकों में भाजपा के खिलाफ कोई बड़ी नाराजगी की सूचना नहीं है और हार्दिक पटेल एवं अल्पेश ठाकोर, दोनों ही भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन वहां आम आदमी पार्टी के रूप में प्रतिरोध की एक नई आवाज उभरी है। आम आदमी पार्टी एक नए राज्य में अपनी शक्ति की आजमाइश कर रही है। अरविंद केजरीवाल ने कई सभाएं की हैं और मोदी एवं भाजपा को सीधे तौर पर ललकारा है। दिल्ली और पंजाब की तर्ज पर उन्होंने मुफ्त बिजली, पानी देने का वादा किया है, युवाओं को रोजगार देने की बात कही है और गुजरात को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की बात भी वह कर रहे हैं। साथ ही 'आप' ने नोटों पर महात्मा गांधी के बदले लक्ष्मी-गणेश के चित्रों को छापने की बातें कर डाली हैं।
यानी भाजपा के पारंपरिक वोटर के बीच भी आम आदमी पार्टी हिंदुत्व का अपना सिक्का जमाने में लगी है और उसी की भाषा में चुनौती पेश कर रही है। कहा जाता है कि गुजरात में ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में मतों का रुझान अलग प्रतीत होता है। कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करती है, लेकिन भाजपा को हरा नहीं पाती। वहीं शहरी क्षेत्रों में भाजपा बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है। आप ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस के वोट में सेंध लगा सकती है, लेकिन क्या वह भाजपा के शहरी मतों में से छोटा-सा हिस्सा भी ले पाएगी?
हाल ही में मोरबी में पुल गिरने से बहुत लोगों की मौतें हुईं, फिर भी भाजपा की स्थिति मजबूत है। प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप का प्रदर्शन कैसे रहेगा और क्या वह राज्य स्तर की पार्टी से राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन पाएगी। अगर गुजरात में कांग्रेस आम आदमी पार्टी की मौजूदगी के बावजूद अपना प्रदर्शन बेहतर कर पाती है और भाजपा के लिए चुनौती बन पाती है, तो इससे विपक्ष की भावी दिशा का पता चलेगा। प्रधानमंत्री के गृह राज्य में अगर भाजपा को नुकसान होता है, तो यह विपक्ष के लिए मनोबल बढ़ाने वाला होगा।
अब बात हिमाचल प्रदेश की। यहां भी भाजपा की सरकार है। जमीन पर सत्ता के खिलाफ कुछ रोष भी देखने को मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से सेब उत्पादकों के बीच कम दाम मिलने से नाराजगी है, तो शहरी क्षेत्रों में नई पेंशन स्कीम के तहत कम पैसे मिलने का मुद्दा प्रबल है। लोग पुरानी पेंशन फिर से बहाल करना चाहते हैं। इसके अलावा भाजपा ने लगभग 11 विधायकों की टिकटें काट दी हैं, जिनमें से कुछ बागी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।
कुल मिलाकर माना जाता है कि भाजपा के समक्ष चुनावी चुनौती कड़ी है, लेकिन प्रतिपक्ष में कांग्रेस पार्टी है। हिमाचल के बड़े नेता आनंद शर्मा कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के आलोचक हैं। प्रियंका गांधी राजीव शुक्ला के साथ कांग्रेस की चुनावी मुहिम संभाले हुई हैं। पर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की चुनौती में दम है। क्या लोग वाकई सत्ता परिवर्तन के प्रति इच्छुक हैं या केवल भाजपा पर दबाव बनाना चाहते हैं? हिमाचल एक छोटा राज्य है, जहां जीत-हार के छोटे अंतर पर भी राजनीतिक संभावनाएं टिकी रहती हैं।
नतीजे से यह स्पष्ट हो जाएगा कि कांग्रेस की पदयात्रा से किसी राजनीतिक विकल्प का सृजन हो पा रहा है या नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य चुनाव की रैलियों में पूरी मेहनत कर रहे हैं। गुजरात का चुनाव उनके लिए निजी सम्मान का मामला है, तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और मोदी के भरोसेमंद मंत्री अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। इसलिए यह देखना भी दिलचस्प होगा कि हिमाचल में भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है?