आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी हादसा केवल एक पनडुब्बी के डूबने और 18 नौसैनिकों के जीवन गंवाने की घटना भर नहीं है। इसके चलते हमारी पूरी सुरक्षा नीति और तैयारियों पर सवाल उठ रहे हैं। क्या वास्तव में हम जल क्षेत्र के प्रति पूरी तरह चौकस हैं? इस हादसे को लेकर इंडियन डिफेंस रिव्यू के संपादक भरत वर्मा से वेद विलास उनियाल ने बात की -
आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी हादसे को किस तरह देखते हैं। नौसेना क्षेत्र में इससे कितना नुकसान हुआ है?
सबसे बड़ा नुकसान तो यही है कि हमारे पास यही अकेली आधुनिक किस्म की पनडुब्बी थी। हालांकि 1971 में तैयार इस पनडुब्बी का जीवन भी पूरा हो गया था, लेकिन रूस में अपग्रेड करके इससे फिर भी काम चलाया जा रहा था। यह मिसाइलों से लैस थी। भारत को अपने जल क्षेत्र में कम से कम 25 से 30 सबमरीन की जरूरत है, लेकिन अभी 14 से ही काम चलाया जा रहा है। बाकी बची 13 पनडुब्बियां भी पुरानी हो चुकी हैं। इसलिए उन्हें लेकर हमेशा आशंका बनी रहती है। हाल यह है कि सिंधुरक्षक को जिस कीमत पर खरीदा गया था, उसको अपग्रेड करने में उससे ज्यादा पैसा लगा।
फिर सैन्य क्षेत्र में नई आयुध-पनडुब्बी के प्रति उदासीनता क्यों हैं?
सैन्य क्षेत्र में हर पंद्रह साल बाद इसकी समीक्षा की जाती है कि आगे हमें किन-किन रक्षा संसाधनों को तैयार करना है? किनका आधुनिकीकरण करना है? कहां क्या कमियां हैं और किस तरह अपनी चौकसी बढ़ानी है? मगर सरकार के स्तर पर उदासीनता दिखती है। सेना के सुझाव की जितनी अहमियत होनी चाहिए, वह कभी देखी नहीं गई। सब अपने ढर्रे पर चल रहा है। जिसका नतीजा है कि पुराने आयुधों के साथ हम सीमाओं पर हैं। अलबत्ता हमारे पड़ोसी चीन के पास बहुत आधुनिक किस्म की पनडुब्बी हैं।
जिस तरह चीन ने हिंद महासागर में अपनी रुचि दिखाई है, कहा जा रहा है कि यह समुद्री क्षेत्र से भी भारत को घेरने की कोशिश है, आप भारत की तैयारियों को किस तरह देखते हैं?
बहुत बुरी स्थिति तो नहीं है, लेकिन हमारे पास अच्छी पनडुब्बी होनी चाहिए। युद्धपोत बनाने में भारत को महारत है, बल्कि हमारा नेवल डॉकयार्ड विश्व स्तर का है। अगर हमारे पास उन्नत किस्म की पनडुब्बी होती, तो भारतीय नौसेना बेमिसाल होती। गौर करना चाहिए कि युद्ध तभी जीते जाते हैं, जब जल, थल और वायु तीनों सेनाएं मजबूत हों।
देखा गया है कि देश के लोगों में जितनी रुचि और ज्ञान थल और वायु सेना के प्रति रहता है, उतना नौसेना के प्रति नहीं?
ऐसा नहीं है, समुद्री सीमा वाले राज्यों के लोग इसके बारे में जानकारी रखते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा या उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जरूर युवाओं को इस सैन्य क्षेत्र के बारे में कम जानकारी रहती है। हां, यह सच है कि संवेदना के धरातल पर अभी कश्मीर पंजाब या पूर्वी भारत की कोई घटना लोगों को ज्यादा झकझोर देती है, और नौसेना क्षेत्र की घटना पर वह हलचल नहीं होती। लिहाजा सरकार की कोशिश होनी चाहिए कि नौसेना के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाएं। स्कूल-कॉलेज के बच्चों को इन सैन्य ठिकानों में ले जाकर, प्रदर्शनियों के माध्यम से या स्कूली किताबों के जरिये जोड़ा जा सकता है। नौसेना बहुत अहम है, उसने समय-समय पर समुद्री अपबंधकों को भी छुड़ाया है। नौसेना का अपना सुरक्षा कवच होता है और हर देश समुद्र में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करता है। अभी ईरान ने इराक से तेल लाने वाले भारत के एक जहाज को रोका हुआ है। इससे साबित होता है कि समुद्री सीमा पर दबंग दिखाने की कोशिश हर जगह होती है। भारत को कहीं कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।