अभी कुछ दिन पहले ही चीन यात्रा के दौरान बीजिंग में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के विचार केंद्र में वहां के निदेशक और वरिष्ठ भारत-नीति विश्लेषक से चर्चाएं हुईं। चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग की भारत यात्रा का उल्लेख हुआ, तो मैंने कहा, लद्दाख की घटनाओं के बावजूद भारत ने ली केचियांग का गर्मजोशी से स्वागत किया, क्योंकि हमारी मंशा तनाव कम करते हुए दोस्ती बढ़ाने की है। लेकिन चीनी सैनिकों की लद्दाख में बार-बार घुसपैठ से न केवल माहौल खराब होता है, बल्कि भारतीय जनता में चीन के प्रति अविश्वास का भाव भी बढ़ता है।
इस पर चीनी विश्लेषकों का कहना था कि भारत का विपक्ष और मीडिया नाहक चीनी घुसपैठ के कथित हौआ को बढ़ा रहा है, क्योंकि जिस क्षेत्र में चीनी सैनिकों की आवाजाही को घुसपैठ बताया जा रहा है, वह विवादास्पद है तथा उसके आसपास भारत की लगातार बढ़ रही सैन्य उपस्थिति गलत है। मैंने कहा कि जब आप उस क्षेत्र को विवादास्पद मानते हैं और आपने यह तय कर लिया है कि उसका आपसी चर्चा से समाधान निकाला जाएगा, तो फिर चीनी सैनिकों की गश्त के क्या अर्थ हैं? इस प्रश्न का जवाब नहीं मिला, सिवाय गोलमोल स्पष्टीकरण के कि चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में जाते ही नहीं हैं। उनकी भारतीय क्षेत्र में दखल की खबरें दिल्ली मीडिया द्वारा युद्ध जैसा तनाव पैदा करने की कोशिश है। एक और अनाधिकृत, लेकिन पर्याप्त वजन के साथ तर्क दिया जाता है कि भारत और चीन की बढ़ती दोस्ती से चिंतित अमेरिका अपने समर्थक पत्रकारों द्वारा ऐसी खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करवा रहा है, ताकि भारत में चीन के प्रति शत्रुता का भाव गहरा हो।
बेशक अमेरिका भारत-चीन मैत्री से चिंतित हो सकता है। ऐसे में, भारत-चीन संबंध हमें अपनी स्वतंत्र नीति के आधार पर तय करने होंगे, पर चीन की दबंगई को हम एकतरफा मैत्री की आकांक्षा के चलते नजरंदाज नहीं कर सकते तथा सीमा सुरक्षा से समझौते की वही गलतियां नहीं दोहरा सकते, जो 1962 से पहले की थी।
लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ को चीन घुसपैठ मानता ही नहीं, जबकि चीन के साथ दोस्ती की हमारी कोशिशें जारी हैं। इंदिरा गांधी ने बीजिंग की लगातार कोशिशों को ठुकराते हुए कभी चीन की यात्रा नहीं की, लेकिन राजीव गांधी के समय एक नई शुरुआत हुई। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो सीमा विवाद सुलझाने तथा व्यापार बढ़ाने का नया अध्याय शुरू हुआ। चीन ने भारतीय संवेदनाओं को समझते हुए पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति बनाने का आश्वासन दिया और कारगिल युद्ध के समय निरपेक्ष रहा। लेकिन नक्शों में अरुणाचल और कश्मीर को क्रमशः चीन और पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना और भारतीयों के चीन वीजा में भेदभाव जारी रहा। आपसी समझौते भी होते रहे-सात सितंबर, 1993 को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने, 29 नवंबर, 1996 को सैन्य मामलों में वास्तविक सीमा रेखा पर परस्पर विश्वास बढ़ाने तथा एक-दूसरे की सैनिक उपस्थिति की जानकारी साझा करने, 11 अप्रैल, 2005 को राजनीतिक संवाद बढ़ाने, 31 मई, 2006 को सैन्य सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम करने तथा 17 जनवरी, 2012 को वास्तविक सीमा रेखा पर अचानक भड़कने वाली उत्तेजनात्मक परिस्थिति सुलझाने के लिए राजनयिक परामर्श के समझौते हुए। लद्दाख में चीनी सैनिकों की लगातार दखल इन समझौतों का उल्लंघन है।
चीन के साथ हमारी लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसमें से तीन हजार किलोमीटर पर विवाद है। दूसरी ओर, चीन के साथ हमारा व्यापार अगले दो वर्षों में सौ अरब डॉलर तक पहुंचने वाला है, यानी अमेरिका से भी ज्यादा। चीन सीमा विवाद जल्द हल नहीं करेगा और युद्ध से भी समाधान संभव नहीं। ऐसे में भारत के पास एकमात्र उपाय है कि सैन्य शक्ति एवं आर्थिक विकास के मामले में चीन की बराबरी करते हुए चीनी घुसपैठ पर कठोर राजनयिक कदम उठाए। जरूरी हो, तो चीन को भारत में व्यापार बढ़ाने की अनुमति पर रोक लगाने के उपाय को आजमाया जा सकता है। एकतरफा दोस्ती ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती। दोस्ती की ईमानदार चाहत का प्रमाण चीन से भी मिलना चाहिए।