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लव ने लपेट लिया

Wed, 24 Sep 2014 08:32 PM IST
सुरजीत सिंह
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वह सूखी बेल से मुरझाए हुए बरामदे में पड़े थे। नतीजों के बेरहम हाथों लुटे-पिटे। पीछे बज रहे रेडियो पर ज्यों ही रफी ने दर्द भरी तान छेड़ी कि उन्होंने झपटकर रेडियो बंद किया और खुद को फिर से कुर्सी में फेंक दिया। यह दृश्य देख मैंने लगभग छूट चुकी हंसी को रिश्वत की तरह जब्त करते हुए कहा, बेचारे रफी साहब ने आपका क्या बिगाड़ा है? यह तो आपके उत्साह के अतिरेक का परिणाम है। जैसे पिछली बार दिल्ली में झाड़ू ने कांग्रेस को बुहार दिया था, वैसे ही इस बार लव ने आपको लपेट लिया।
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रफी साहब को चुप कराया, तो आप चालू हो गए, उन्होंने जुबान को मिसाइल की तरह तैनात करते हुए कहा, सांत्वना देने आए हैं या घावों पर नमक छिड़कने? हम तो सदा से कहते आए हैं कि लव शब्द ही अपशकुनी है। इसके लिए युद्ध हुए, खून की नदियां बहीं, राज-पाट तक गए।

दुख है कि फिर भी आपने सबक नहीं सीखा! और यह इतिहास में नहीं, खुद में झांकने का वक्त है। यह क्यों नहीं कहते कि 'लव जेहाद' ने आपका बेड़ा गर्क किया है? पहले तो बड़े शौक से जेहादी बनने चले थे, अब कुर्बानी दीजिए!
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हम हर उस प्रेम के खिलाफ हैं, जो हमारी संस्कृति के लिए खतरा है, उन्होंने तीखे शब्दों में कहा। आपकी संस्कृति इतनी छुई-मुई क्यों है कि जहां भी प्रेम के लक्षण नजर आए, वहीं एक कोने में बैठ बिसूरने लगती है और आप लव के नाम पर लावा बन जाते हैं?
तो क्या आप भी मानते हैं कि हमें सचमुच लव जेहाद ने मरवाया है? वह एकाएक आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गए।

और क्या? आपका लव कनेक्शन सदा से ही टेढ़ा है। कहां तो आप विकास के सौंदर्य पर लोगों को रिझा रहे थे, महंगाई को ऊंची अटरिया से उतारने का वायदा कर रहे थे, और कहां आते ही लव जेहाद, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मसले छेड़ बैठे। यह जीत के मद में छाई नीम बेहोशी तोड़ने की दवा है, जो जनता ने दी है। कड़वी जरूर है, पर आंख मूंदकर गटक जाइए और दिल में लव-शव बोइए।
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वह मेरी ओर कातर निगाहों से देखते हुए लगभग रो से दिए।
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