हालांकि रेमिटेंस यानी विदेशों में काम कर रहे लोगों द्वारा देश में भेजी गई रकम का आंकड़ा उत्साहपूर्ण है। वर्ष 2022 में विदेशों से देश में भेजी गई धनराशि लगभग एक खरब अमेरिकी डॉलर रही, जो 2021 की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक थी। रेमिटेंस में वृद्धि का प्रमाण विभिन्न राज्यों में उपभोग की प्रवृत्ति में देखा जा सकता है और केरल का उदाहरण खास तौर से हमारे सामने है। वैश्विक मंदी की तमाम आशंकाओं के बावजूद देश के समृद्ध वर्ग के खर्च में कमी नहीं आई है।
एक आंकड़ा बताता है कि अगले पांच साल में देश में विलासिता की वस्तुओं के बाजार में 10 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है। रणनीतिक समझौतों के जरिये भारत में प्रवेश करने के लिए दुनिया भर के मशहूर ब्रांड्स की कतार लगी है। वर्ष 2022 में बलेनसिएज, मैसन वैलेंटिनो और प्रसिद्ध फ्रेंच लक्जरी डिपार्टमेंटल स्टोर गैलरीज लफायेट ने भारत के बाजार में प्रवेश करने की घोषणा की। इस बीच देश में अमीरों की संख्या और उनकी दौलत में वृद्धि हुई है। ये विलासिता की वस्तुओं के बाजार को गति दे रहे हैं।
ऑटोमोबाइल उद्योग से जुड़ा एक आंकड़ा बताता है कि वर्ष 2022 में देश में लगभग 38,000 लग्जरी कारों की बिक्री हुई। वर्ष 2021 की तुलना में यह बिक्री 50 फीसदी ज्यादा रही, जो निश्चित तौर पर उल्लेखनीय है। हालांकि वर्ष 2018 में लग्जरी कारों की बिक्री सर्वाधिक रही थी। तब देश भर में करीब 40,000 लग्जरी कारों की बिक्री हुई थी। एक आंकड़े के मुताबिक, पिछले साल लगभग 37.9 लाख कारों की बिक्री हुई, जो वर्ष 2021 की तुलना में 23 प्रतिशत ज्यादा रही। इनमें भी 10 लाख रुपये तक की कीमत वाली कारों की बिक्री की हिस्सेदारी 41 फीसदी थी। पिछले वर्ष जर्मनी की लग्जरी कार कंपनी मर्सिडीज बेंज की 15,822 कारों की बिक्री हुई। आंकड़ों के हिसाब से वर्ष 2022 में देश में मर्सिडीज बेंज की बिक्री में 41 प्रतिशत वृद्धि हुई, जो अब तक का सर्वाधिक है। यही नहीं, इस कंपनी के पास देश में और 6,000 कारों की आपूर्ति का ऑर्डर है। पिछले साल महंगे स्मार्टफोन की बिक्री भी बढ़ी। इस संबंध में एक आंकड़ा बताता है कि पिछले वर्ष की आखिरी तिमाही में देश में एपल आईफोन 13 की बिक्री सबसे अधिक रही।
केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 30 खरब की और अगले पांच वर्ष में 70 खरब की बन जाएगी।
जाहिर है, अर्थव्यवस्था की यह गुलाबी तस्वीर प्रभावित करती है। इसे देखकर कोई भी कह सकता है कि ऐसे में समस्या की क्या बात है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों की टिप्पणियां हैं कि देश में वस्तुओं और सेवाओं के मौजूदा उपभोग का पैटर्न उच्च आय वर्ग के पक्ष में है। यानी उपभोग में बड़ी हिस्सेदारी धनाढ्य और नवधनाढ्य वर्गों की है। उपभोग की स्वस्थ तस्वीर वह है, जिसमें समाज के सभी वर्गों की अधिक से अधिक हिस्सेदारी हो। जाहिर है कि अर्थव्यवस्था के बेहतर स्थिति में होने के बावजूद अभी वह स्थिति नहीं आई है कि मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की मांग भी तेजी से बढ़ी हो।
ऐसा न होने का बड़ा कारण बेरोजगारी है। जैसा कि दूसरे कई देशों के मामले में भी देखा गया है कि अर्थव्यवस्था के कुछ खास क्षेत्रों में मांग बढ़ने या जीडीपी में वृद्धि होने का मतलब यह कतई नहीं है कि सबके पास नौकरी या रोजगार है। भारत जैसे देश में, जहां अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार ही ज्यादा है, रोजगार का सटीक आंकड़ा प्राप्त करना हमेशा से कठिन रहा है। जाहिर है, इस क्षेत्र में जरूरी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि 1.4 अरब की आबादी वाले इस देश में बढ़ते श्रम बल के अनुपात में रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है।
सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी) के मुताबिक, देश में बेरोजगारी की दर सात से आठ फीसदी के बीच है, जबकि पांच साल पहले यह दर लगभग पांच प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी अधिक है। चूंकि कृषि ज्यादा लोगों को रोजगार में खपा लेती है, इसके अलावा ग्रामीण भारत में मनरेगा की योजना काम करती है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी कम दिखती है। जबकि शहरी भारत में रोजगार की ऐसी कोई योजना नहीं है।
भारतीय शहरों में ज्यादातर लोगों को चूंकि अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है, ऐसे में इससे से जुड़े लाखों लोगों को रोजगार में स्थायित्व की गारंटी नहीं है। विश्व अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूती के लिए पहचाने जाने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के इस स्याह पक्ष की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हालांकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के तहत केंद्र सरकार की नई योजना, जिसे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना नाम दिया गया है, रोजगार की इस चुनौती को ध्यान में रखती है, जिसका लाभ 80 करोड़ से अधिक लोगों को मिल रहा है। इस नई योजना में लाभार्थियों को मुफ्त में अनाज दिया जा रहा है, लेकिन इन लाभार्थियों को महामारी के दौरान जो अतिरिक्त अनाज मिल रहा था, वह नहीं मिलेगा।
लिहाजा अर्थव्यवस्था की बात करते हुए समाज के निचले स्तर के लोगों की बात नहीं भूलनी चाहिए। जब हम बजट के लिए तैयार हो रहे हैं, तब यह हमारे नीति निर्माताओं की प्राथमिकता में होना चाहिए। सरकार के लिए चुनौती सिर्फ आर्थिक वृद्धि को रफ्तार देना ही नहीं है, बल्कि इस बारे में भरोसा जगाना है कि इस आर्थिक मजबूती का लाभ गरीबों को भी मिलेगा। बेरोजगारी और महंगाई की मार से गरीबों को बचाने के लिए भी कदम उठाने चाहिए, जो बेशक आसान नहीं है, पर इस दिशा में प्रयास तो होने ही चाहिए।