आरबीआई के बाद अब अगर आईएमएफ के अनुमान लगभग एक ही दिशा में इशारा करते हैं, तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। आईएमएफ ने भारत की विकास दर के अनुमान में बढ़ोतरी के पीछे उम्मीद से बेहतर आर्थिक गति, घरेलू मांग में मजबूती और सेवा क्षेत्र की बेहतर गतिविधियों को प्रमुख कारण बताया है। हालांकि, किसी भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आकलन केवल जीडीपी वृद्धि दर से नहीं किया जा सकता। यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि इस वृद्धि के साथ कितने नए रोजगार पैदा हो रहे हैं, श्रमिकों की आय कितनी बढ़ रही है और छोटे कारोबारियों तथा किसानों की आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हो रहा है।
घरेलू मांग को अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रमुख आधार बताया जा रहा है, लेकिन इस मांग को लंबे समय तक कायम रखने के लिए लोगों की आय में स्थायी बढ़ोतरी जरूरी है। इसके लिए रोजगार के अवसरों का विस्तार, कृषि उत्पादकता में सुधार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती और छोटे एवं मझोले उद्यमों को प्रोत्साहन देना होगा। इस संदर्भ में विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट भी उल्लेखनीय है, जिसके अनुसार, भारत में गरीबी दर 2028 तक घटकर 12.1 फीसदी रहने का अनुमान है।
हालांकि, गरीबी कम होने की गति धीमी रहने की भी आशंका है। भारत के सामने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने की चुनौती भी कम गंभीर नहीं है। सेवा क्षेत्र की उपलब्धियां अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी ताकत हैं, पर रोजगार की विशाल जरूरतों को पूरा करने के लिए विनिर्माण व श्रम-प्रधान उद्योगों का विस्तार जरूरी है। इससे न केवल घरेलू रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि निर्यात को भी गति मिलेगी। आईएमएफ के बेहतर अनुमान भारत के लिए उत्साहवर्धक हैं। ये संकेत देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ने की क्षमता है। मगर इन अनुमानों को उपलब्धि का अंतिम प्रमाण मानने के बजाय इन्हें आर्थिक सुधारों की गति तेज करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।