जैसे ही फेसबुक का स्टेटस कांपा, मेरी भी कुर्सी-टेबल सब हिलने लगी। देखते ही देखते चारों तरफ हड़कंप मच गया, कि कितने लोगों ने अपने ही मकान की छत को गिरते हुए देखकर भी झट फेसबुक पर फोटो अपलोड की। जान की परवाह किए बगैर किस प्रकार लोग एक के बाद एक स्टेटस और तस्वीरें अपलोड कर रहे थे कि देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए थे। ये लोग दीवार के नीचे दबते-दबते भी सेल्फी लेना नहीं भूले। भूकंप का आंखों देखा हाल लिखने और फोटो खींचने वाले ये लोग सिपाही से कम नहीं लग रहे थे। अगर भूकंप की फेसबुक रपट लिखते-लिखते ये शहीद हो जाते, तो संभव है, उनके परिवार वाले सरकार से मुआवजा मांगने में भी न हिचकते।
खैर फेसबुक पर एक सकारात्मक टिप्पणी भी आई कि कम से कम आज तो ये चैनल वाले केजरी या मोदी जी को छोड़ अलग ढंग की चर्चा कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि जान आफत में है और इन्हें चर्चा की पड़ी है। जब मैंने पड़ोसियों को आगाह किया कि बिल्डिंग से बाहर निकला जाए, तो सब हंसने लगे। सबको पानी पिलाता हुआ नंदू बोला-अब भूकंप से डर नहीं लगता मैडम। कमाल है! आज इंसान ने भगवान के कहर से ही डरना छोड़ दिया है। बल्कि भगवान को याद न करके इसका जिम्मेदार सरकार को बता रहे हैं।
जो लोग भूकंप आते ही पहले राम-राम करते हुए घरों से बाहर भागना शुरू कर देते थे, वे सब इस बार घर से भागे भी, तो मोबाइल हाथ में लेकर या फिर घर के कोने में ही लैपटॉप खोलकर बैठे रहे। फेसबुक पर यह जरूरी हिदायत भी मिल रही है, बेटा अपना एटीएम कार्ड और मोबाइल संभालकर, हाथ में लेकर ही बाहर आना। स्टेटस अपडेट होते रहना भी जरूरी है, ताकि सबको खबर मिलती रहे।
हालत यह हो गई है कि बेटा नाराज हो गया कि जब भूकंप आया था, तब उसे क्यों नहीं उठाया गया। मानो उसके लिए भूकंप कोई फिल्म हो। सासू मां का कहना है कि जो होगा, देखा जाएगा, भूकंप से क्या डरना! सही है, जब फेसबुक पर भूकंप का हाल बयान करने वाले सिपाही हैं, तब इससे कैसा भय!