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भूकंप मेरे घर में

Sun, 03 May 2015 06:33 PM IST
पूरन सरमा
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वे आठ थे- नवयुवक मंडल के कार्यकर्ता। भूकंप पीड़ितों के लिए चंदा लेने आए थे। वे खाली पन्नों में नाम लिखते जा रहे थे और चंदा लेने में जुटे थे। मेरे घर आकर वे मायूस से बैठ गए। मैं कुछ कहता, इससे पहले ही उनमें से एक ने गंभीर होकर पूछा, आप कितने पैसे दे रहे हैं? आप तो समझदार हैं। भूकंप पीड़ितों के साथ जो बीत रही है, उसका हम क्या बयान करें! जो भी श्रद्धा हो, चंदा दे दीजिए।
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मैंने कहा, एक दिन का पूरा वेतन मैंने इस कोष में दे दिया। बच्चे स्कूल में अलग से ले गए हैं। मेरी पत्नी ने भी महिला मंडल को यथासाध्य चंदा दिया है। इसलिए मैं अब योगदान करने की स्थिति में नहीं हूं। फिर आपके पास न तो छपी हुई रसीद है, न आपकी संस्था ही रजिस्टर्ड है।

वे सब एक साथ चौंककर खड़े गए, आपने एक साथ कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल पीड़ितों की सहायता का है। हमने भूकंप पीड़ितों को इक्कीस हजार रुपये देने का निश्चय किया है। देखिए, कॉलोनी में किसी ने इक्यावन, तो किसी ने एक सौ एक रुपये दिए हैं। आप तो अच्छी नौकरी में हैं। जो देना है, दे दीजिए। इसमें पक्की रसीद का क्या काम? रसीद छपवाने में जो खर्च आता, हम वह भी भूकंप पीड़ितों को देना चाहते हैं।
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मैं बोला, सवाल सेवा से मुकरने का नहीं है। सवाल मेरे कोष का है। नेपाल में आया भूकंप दुखद है। पर अब मेरे घर पर भी अकाल के बादल मंडराने लगे हैं।

कमाल कर दिया साहब आपने तो। सरकारी कर्मचारी होकर अभावों का रोना रोने लगे।

लेकिन भाई मैं करूं क्या? गिनी-गिनाई तनख्वाह मिलती है। भूकंप पीड़ितों के लिए देश-दुनिया से इतना पैसा पहुंच रहा है कि एक मेरे देने-न देने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। पर वे नहीं माने। मुझे वे पैसे देने पड़े, जो बाजार जाने के लिए रखे थे। आज घर में छोटा-मोटा आयोजन था।
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पत्नी अपनी सहेलियों को आमंत्रित करके लौटने वाली थीं, और मैं आने वाले 'भूकंप' का इंतजार कर रहा था।
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