राहुल गांधी पिछले दिनों लोकसभा में इतनी बार बोले, जितना पिछले दस वर्षों में नहीं बोले होंगे। और अपने हर भाषण में उन्होंने नरेंद्र मोदी को 'आपके प्रधानमंत्री' कहा है। देश के प्रधानमंत्री कहने पर वह तभी मजबूर हुए, जब भाजपा सांसदों ने उन्हें याद दिलाया कि मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। कांग्रेस के युवराज ने इसे स्वीकार तो किया, पर इन शब्दों में, आपके होंगे, देश के होंगे, लेकिन किसान-मजदूरों के नहीं हैं।
राहुल जी को अभी तक मंजूर नहीं है कि गुजरात से आया चायवाले का यह बेटा उस जगह आसीन है, जहां बैठना कभी उनका जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता था। अरे भाई, आपके परनाना, आपकी दादी, आपके पिताजी अगर प्रधानमंत्री रहे होते, तो आपको भी बुरा लगता, अगर इस कुर्सी पर कोई मामूली-सा व्यक्ति आकर बैठ जाता! और भी बुरा लगता, अगर पिछले दशक से आपकी मम्मी ने आपको आश्वासन दिया होता कि यह कुर्सी आपकी है। याद कीजिए, 16 मई, 2014 का वह दिन। याद कीजिए, किस अंदाज में सोनिया गांधी और उनके बेटे ने चुनाव परिणाम स्वीकार किए थे। दोनों ने बधाई दी थी 'नई सरकार' को, मोदी को नहीं। इसलिए कि उन्हें न तब मोदी का प्रधानमंत्री बनना स्वीकार था, न आज है। सो जब से राहुल गांधी छुट्टियां मनाकर लौटे हैं, उनके निशाने पर मोदी ही हैं। इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति है।
रणनीति यह है कांग्रेस की कि हर तरह से मोदी पर वार किया जाए, ताकि वह देश में परिवर्तन और विकास लाने के वायदे कभी पूरा न कर सकें। जहां युवराज साहिब संसद में प्रधानमंत्री पर सीधा वार कर रहे हैं, वहीं उनके करीबी सलाहकार दिग्विजय सिंह ट्विटर पर हावी हो गए हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने मोदी के 'मन की बात' की तुलना हिटलर से की।
भूमि अधिग्रहण को लेकर बहुत चर्चा हुई है टीवी पर और अखबारों में। राजनीतिक पंडितों ने कहा है कि यह मुद्दा किसानों के लिए इतना नाजुक है कि राहुल जी ने इसे उठाकर राजनीतिक शतरंज की बिसात पर मोदी को मात दे दी है। उनकी बातें सुनने के बाद मैंने थोड़ी तहकीकात निजी तौर पर की। मेरा भाई हरियाणा में किसान है, और मेरे कहने पर उन्होंने कई किसानों से बात करने के बाद यह जानकारी मुझे दी कि उन्हें भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से कोई वास्ता नहीं है। मेरे भाई के शब्दों में, मैंने कई किसानों से बात की, मगर एक भी ऐसा किसान नहीं मिला, जिसे यह संशोधन समझ में आ रहा हो। समस्या उनकी सिर्फ फसलों के तबाह होने से है। इस कानून से किसी को कोई लेना-देना नहीं है।
भूमि अधिग्रहण कानून का मुद्दा एक बहाना है कांग्रेस के लिए। यह मुद्दा न होता, तो कोई और मुद्दा होता। क्योंकि मकसद किसानों को राहत पहुंचाना नहीं है, मकसद है, मोदी को तकलीफ देना। आने वाले दिनों में हर दूसरे-तीसरे दिन कोई नया मुद्दा उठाया जाएगा, जिसे लेकर संसद के अंदर भी हल्ला मचाया जाएगा और बाहर भी। मोदी सरकार के चार वर्ष बाकी हैं। लेकिन कांग्रेस के उच्च स्तरीय सूत्र मानते हैं कि सरकार को बार-बार अगर घेरा जाएगा, तो मोदी किसी हाल में सफल नहीं हो पाएंगे। और ऐसे में 2019 के चुनाव में उनकी पराजय तय हो जाएगी। इससे एक बार फिर आएगी राहुल गांधी की बारी। लेकिन ऐसा करने से देश का नुकसान तो होगा, पर इसकी परवाह किसको है?