ऐसे में जलवायु परिवर्तन और उसकी रोकथाम की तरफ ध्यान जाना लाजिमी है। विशेषकर तब, जब ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से बाहर हो गया था, जिससे वैश्विक जलवायु सहयोग को झटका लगा था। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी का मतलब एक बार फिर जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल सहयोग से अमेरिका के अलग रहने की प्रबल आशंका है, जैसा कि पहले भी देखा गया था। इस बार भी उनकी नीतियों में जलवायु वित्तपोषण और स्वच्छ ऊर्जा निवेश को प्राथमिकता मिलने की संभावना कम है।
इतिहास साक्षी है कि वर्ष 2001 में जब बुश ने क्योटो प्रोटोकॉल छोड़ा और 2016 में जब ट्रंप ने पेरिस समझौते से मुंह मोड़ा, तब भी दुनिया के ज्यादातर देश बड़े पैमाने पर इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने में लगे रहे और ये योजनाएं परवान चढ़ती रहीं। आज भी अमेरिकी सीमाओं से परे एक के बाद एक लगातार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से आए बदलावों को झेल रही दुनिया ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने में जुटी है। वर्ल्ड वेदर एिट्रब्यूशन (डब्ल्यूडब्ल्यूए) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2004 के बाद के पिछले दस वर्षों में जलवायु परिवर्तन के चलते चरम मौसमी घटनाओं के और अधिक घातक रूप ले लेने से साढ़े तीन लाख से अधिक लोग मारे गए। इनमें 2007 में बांग्लादेश का चक्रवात सिद्र, 2008 में म्यांमार का चक्रवात नरगिस, 2010 में रूस की हीटवेव, 2010 में सोमालिया का सूखा, 2013 में फिलीपीन में टाइफून हैयान, 2013 में भारत के उत्तराखंड आई तबाही, 2015 में फ्रांस की हीटवेव, 2022 और 2023 में यूरोप की हीटवेव और 2023 में लीबिया का तूफान डेनियल शामिल हैं।
जाहिर है कि इन हालात के मद्देनजर दुनिया जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ती रहेगी, चाहे अमेरिका इस काम में सहयोग करे या न करे। पिछली बार भी अपने कार्यकाल में ट्रंप ने नवीकरणीय ऊर्जा की जगह तेल को ऊर्जा स्रोत के रूप में तरजीह दी थी। लेकिन विरोधी नीतियों के बावजूद हरित ऊर्जा में अमेरिका का निवेश रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। पवन और सौर ऊर्जा में अरबों डॉलर खर्च किए गए, अकेले 2019 में नवीकरणीय ऊर्जा में अमेरिका ने 55.5 अरब डॉलर का निवेश किया। ब्लूमबर्ग एनईएफ के शोध के अनुसार, अमेरिका ने पवन और सौर ऊर्जा में 2019 में 28 फीसदी की वृद्धि हासिल की, जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर और यूरोप से कहीं ज्यादा आगे थी।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) के अनुसार, 2030 तक दुनिया की नवीकरणीय ऊर्जा में 2.7 गुना बढ़ोतरी का अनुमान है। ऐसे में, अमेरिका का भी इस दिशा में आगे बढ़ना वाजिब दिख रहा है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के समय भी स्वच्छ ऊर्जा निवेश जीवाश्म ईंधन से आगे निकलना शुरू हो गया। पवन ऊर्जा में निवेशित वित्त तेल, गैस और कोयले की तुलना में दोगुना है। हालांकि इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस बार ट्रंप के सत्ता में आने से वैश्विक जलवायु वित्त में कटौती हो सकती है, जिससे विकासशील देशों के लिए अनिश्चितता बढ़ेगी। जहां तक भारत का सवाल है, डोनाल्ड ट्रंप की वापसी भारत के लिए कई मायनों में चुनौतियां और अवसर, दोनों ला सकती है।
वर्तमान में, भारत अपने सौर मॉड्यूल का 90 प्रतिशत अमेरिका को निर्यात करता है। अगले चार वर्षों में भारत को हरित व्यापार को गहरा करने, स्वच्छ तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं के सह-विकास और अपने ऊर्जा परिवर्तन में तेजी लाने और रणनीतिक रूप से सक्षम होने की आवश्यकता होगी। अमेरिकी चुनाव नतीजे इस तथ्य को नहीं बदलते कि भारत और अमेरिका प्रमुख रणनीतिक साझेदार बने रहेंगे। जलवायु वित्त और तकनीकी साझेदारी में कटौती के बावजूद भारत को अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को जारी रखना होगा। वहीं, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए दोनों देश संबंधों को एक नया आयाम दे सकते हैं। विशेषज्ञों की राय से स्पष्ट है कि ट्रंप की जीत भारत के लिए रणनीतिक धैर्य और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित करती है, ताकि वह इन बदलती परिस्थितियों में अपनी प्राथमिकताओं को हासिल कर सके।