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राष्ट्रधर्म निर्वाह की परंपरा

Fri, 29 Mar 2013 11:10 PM IST
शिवकुमार गोयल
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वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। कामता प्रसाद विद्यार्थी तथा श्री अग्रहरि के नेतृत्व में पांच हजार राष्ट्रभक्त काशी के धानापुर कस्बे की जेल में तिरंगा फहराने पहुंचे।
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एक थानेदार ने लोगों पर लाठियां चलवा दीं, जिससे सात लोग घायल हो गए। लोगों के घायल होने की खबर सुनकर भीड़ बढ़ती गई और लोगों ने थानेदार को पीट-पीटकर मार डाला। अंग्रेजों ने अगले ही दिन धानापुर को पुलिस छावनी में बदल डाला। अनेक लोगों के विरुद्ध थानेदार तथा तीन सिपाहियों को पीटकर मार डालने का मुकदमा दायर किया गया।

उनमें से अधिकांश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इससे सारा काशी क्षुब्ध हो उठा। कमलापति त्रिपाठी और श्रीप्रकाश जेल पहुंचे। उन्होंने सजा के विरुद्ध अपील करने की सलाह दी, पर उन ग्रामीणों के पास मुकदमा लड़ने के लिए धन नहीं था।
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श्रीप्रकाश जी ने वकील के नाते उनका मुकदमा लड़ा और अपनी काशी की जमीन बेचकर मुकदमे का शुल्क जमा किया। बाद में महामना मदनमोहन मालवीय जी को श्रीप्रकाश जी द्वारा अपनी जमीन बेचकर मुकदमा लड़ने की बात पता चली, तो उन्होंने कहा, बाबू श्रीप्रकाश ने अपने महान राष्ट्रभक्त पिता डॉ. भगवानदास की तरह राष्ट्रधर्म का निर्वाह कर काशी की महान परंपरा को आगे बढ़ाया है।
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