द्रमुक के हटने के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने भी यूपीए से नाता तोड़ने के संकेत दिए हैं। वह तीसरे मोर्चे के गठन की बात भी कर रहे हैं। इन्हीं मसलों पर लोकसभा में माकपा संसदीय दल के नेता बासुदेव आचार्य से हिमांशु मिश्र ने बातचीत कीः
:- डीएमके यूपीए से अलग हो गई है, मुलायम सिंह भी ऐसा ही संकेत दे रहे हैं। क्या समय पूर्व चुनाव की पटकथा तैयार है?
:- अभी साफ-साफ कुछ नहीं कहा जा सकता। दरअसल इसकी पटकथा लिखने वाली तो सपा और बसपा ही हैं। मगर बसपा अब भी सरकार के साथ है, तो सपा ने अभी तक समर्थन वापसी की घोषणा नहीं की है। हां, मुलायम सिंह नाराज दिखने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। कोशिश इसलिए कह रहा हूं कि उनकी नाराजगी कई बार ऐन मौके पर ठंडी हो जाती रही है। इसलिए अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
:- मगर सदन में सरकार का आंकड़ा तो गड़बड़ा गया है। वाम दलों की ओर से क्या अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की संभावना है?
:- हम अभी अविश्वास प्रस्ताव के विकल्प पर विचार नहीं कर रहे। हम बजट सत्र के दूसरे हिस्से में अनुदान मांगों पर कटौती प्रस्ताव जरूर ला रहे हैं। इस पर होने वाले मतदान से पता चल जाएगा कि कौन सरकार के साथ खड़ा है और कौन नहीं। खासकर मुलायम सिंह की स्थिति साफ हो जाएगी। जब तक उनकी स्थिति साफ नहीं होती, हमारा अविश्वास प्रस्ताव लाने का इरादा नहीं है।
:- मुलायम ने तीसरे मोर्चे की मुहिम छेड़ी है, वह वाम दलों से भी बात करने वाले हैं। कितना भरोसा है वाम दलों को उन पर?
:- सच पूछिए तो हमें बार-बार धोखा दिया गया है। चाहे 2008 में परमाणु करार का मामला रहा हो या फिर हालिया एफडीआई का। मुलायम कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। इसलिए यह तो कहा ही जा सकता है कि फिलहाल हमें उन पर विश्वास नहीं है। हां, अगर वह अपनी बात पर कायम रहते हुए यूपीए से संबंध तोड़ते हैं, तभी कुछ हद तक बात बनेगी।
:- गैर-एनडीए और गैर-यूपीए दलों में एका कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। आखिर तीसरे मोर्चे के गठन के प्रति उदासीनता की स्थिति क्यों है। वाम दल इस दिशा में प्रयास करते क्यों नहीं दिख रहे?
:- फिलहाल हमारा लक्ष्य वाम ताकतों को मजबूत करने का है। अब हम सिर्फ चुनाव के लिए गठबंधन नहीं बनाना चाहते। हमारा मानना है कि कांग्रेस और भाजपा के विरुद्ध जो गठबंधन बने, उसमें नीतिगत एकता के साथ-साथ आपसी विश्वास भी कायम हो। यह नहीं कि बस चुनाव के लिए गठबंधन खड़ा कर उसे तीसरे मोर्चे का नाम दे दिया। इस बार हम सतर्क हैं। इन शर्तों के साथ कोई दल आगे नहीं आया, तो हम अकेले आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।
:- मतलब कि लोगों के सामने यूपीए और एनडीए का ही विकल्प रहेगा?
:- देखिए, सच्चाई यह है कि लोग कांग्रेस और भाजपा, दोनों से बुरी तरह ऊब चुके हैं। जिन राज्यों में इन दोनों दलों का मजबूत विकल्प है, वहां इनकी सरकारें नहीं हैं। जहां तक तीसरे मोर्चे के गठन की बात है, तो मैंने इससे इंकार नहीं किया है। हां, अब हम केवल चुनाव लड़ने के लिए ही तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं करना चाहते।
:- यदि तीसरा मोर्चा बनता है, तो उसमें वाम दलों की क्या भूमिका होगी, क्या माकपा फिर वैसी गलती नहीं दोहराएगी, जिसे ज्योति बसु ने ऐतिहासिक भूल कहा था?
:- वाम दलों में सामूहिक निर्णय होते हैं। कोई एक व्यक्ति किसी भी मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकता। उस समय लगा कि ज्योति बाबू को प्रधानमंत्री बनाना उचित नहीं होगा, इसलिए हमने वह फैसला किया।