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मुद्दा: कचरे से निकला त्रासदी का जिन्न, निस्तारण को लेकर उठे कई सवाल

विनोद पुरोहित
Updated Wed, 08 Jan 2025 07:01 AM IST

सार

अगर अब भोपाल गैस त्रासदी के कचरे में विषैले तत्व बचे ही नहीं हैं, तो इसे निस्तारण के लिए भोपाल से पीथमपुर क्यों लाया गया?
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पीथमपुर में जहरीला कचरा जलाने का विरोध हो रहा है। - फोटो : अमर उजाला


दो जनवरी को तड़के करीब चार बजे कचरे से भरी लाई गईं गाड़ियों का फिलहाल मुकाम रामकी कंपनी है। इसके बाद से इस कचरे को लेकर इंदौर से लेकर पीथमपुर तक विशेषज्ञों सहित अन्य लोगों में भारी आक्रोश रिस रहा है। आपको बता दें मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 2-3 दिसंबर, 1984 को भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी, जिसे भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है। उस त्रासदी में करीब बीस हजार लोग काल के गाल में समा गए थे और जो बच गए, उन्हें भयानक बीमारियों ने घेर लिया। यहां तक कि इस त्रासदी का दंश भोपाल के लोग आज तक झेल रहे हैं। लगभग पांच लाख लोग इससे प्रभावित हुए थे। पीडि़त आज भी न्याय के लिए भटक रहे हैं। यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इस गैस का उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था।


गैस त्रासदी के चालीस साल बाद अब कचरे के रूप में इसका जिन्न फिर उठ खड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सावधानी से कचरे का निस्तारण किया जा रहा है। चालीस साल बाद इसके हानिकारक तत्व खत्म हो गए हैं। इसमें मौजूद नेप्थॉल का प्रभाव करीब 25 साल में समाप्त हो जाता है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद लोगों के सवालों का धुआं और गहरा उठा है। लोगों का कहना है कि यदि अब कचरे में विषैले तत्व नहीं बचे हैं, तो इसे निस्तारण के लिए भोपाल से पीथमपुर क्यों लाया गया? भोपाल में ही उसी स्थान पर उसे नष्ट क्यों नहीं कर दिया गया?


बताया जा रहा है कि जिस जगह पर यह घातक कचरा पड़ा था, वहां की मिट्टी खुरच-खुरच कर उठाई और पीथमपुर लाई गई है। यह कृत्य भी संदेह पैदा करने वाला है। आखिर ऐसा क्यों किया गया? यह भी बड़ा मुद्दा है कि कचरा निपटान के लिए पीथमपुर ही क्यों लाया गया? लोगों को कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च करके इतनी सावधानी से पीथमपुर लाने के बजाय यह कचरा अमेरिका भेजा जाना चाहिए था, जहां की यह कंपनी थी। आखिर सरकार इसके लिए दबाव क्यों नहीं बना रही? उधर, विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि कचरे में एक टन मर्करी है। लेड और अन्य कैंसर कारक केमिकल भी हैं। इसकी जांच सतही तौर पर की गई है। चर्म रोग, अस्थमा, बीपी की जांच कराई गई, जबकि, कैंसर व अन्य घातक बीमारियों की नहीं कराई। वे तत्व क्षेत्र की मिट्टी-पानी को खराब कर रहे हैं।


तमाम आशंकाओं, सवालों और आक्रोश के बाद अब जनप्रतिनिधि और अफसर ‘बैठक-बैठक’ खेल रहे हैं। जनता को भरोसा दिलाने के लिए तमाम तरह की दलीलें दी जा रही हैं। इसमें यह भी शामिल है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक अपनाई जा रही है। पीथमपुर में रैली निकालकर बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने घातक कचरा जलाने के खिलाफ अपनी आवाज उठाई है। यह आवाज बुलंद करने के लिए कुछ लोग दिल्ली में जंतर-मंतर तक पहुंच गए हैं। हालांकि अभी कचरा गाड़ियों से बाहर नहीं निकाला गया है, लेकिन अनिश्चितता का कोहरा घना है। देखना है कि कचरे को जलाने से पहले जनता में भड़की विरोध की ‘आग’ को सरकार कैसे शांत करती है। आशंकाओं, आक्रोश और किसिम-किसिम की अफवाहों का ‘रिसाव’ अभी तेज है।

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