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पारंपरिक बाजार पर दोहरी मार

मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Wed, 11 Oct 2017 09:25 AM IST
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मधुरेन्द्र सिन्हा
दिवाली आ गई है, लेकिन बाजारों में फिलहाल वह गर्माहट नहीं है, जो पिछले वर्षों में देखने को मिलती रही है। व्यापारियों की मानें, तो दिवाली का खाता अभी नहीं खुला है। इंतजार है, ग्राहकों और खरीदारों का। अगर हम दिल्ली के बाजारों पर एक नजर डालें, तो हमें पता चलता है कि अब तक खरीदारी शुरू भी नहीं हुई है। दिल्ली इसलिए कि यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र है। यहां से देश की अर्थव्यवस्था की नब्ज मापी जा सकती है। यहां इस बार वह माहौल नहीं बन पाया है, जो पहले बना करता था। दशहरा के तुरंत बाद दिवाली की खरीदारी शुरू हो जाती थी। थोक बाजारों में रौनक आ जाती थी और पूछताछ चल निकलती थी। लेकिन इस साल तो अभी ठीक से गहमागहमी भी नहीं है। 


हमारे त्योहार सैकड़ों वर्षों से खुशियां देते आए हैं, लेकिन साथ ही साथ व्यापार-कारोबार को बढ़ावा देते भी रहे हैं। हर पर्व में अलग तरह की बिक्री होती है, जिससे अर्थव्यवस्था के पहिये घूमते रहते हैं। और दिवाली तो व्यापारियों, कारोबारियों तथा निर्माताओं का सबसे पसंदीदा त्योहार रहा है, क्योंकि इसमें सभी तरह के सामानों की बिक्री होती है। भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यातोन्मुखी न होकर उपभोगन्मुखी है। यानी यहां जितना उपभोग बढ़ेगा अर्थव्यवस्था में उतनी ही तेजी आएगी। लोगों का सामान खरीदना एक मापदंड है। यहां खरीदारी ही मैन्युफैक्चरिंग उद्योग का भाग्य तय करती है। दिवाली इकलौता त्योहार है, जिसमें कपड़े से लेकर स्वर्णाभूषण और मिट्टी के दीयों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक बड़े पैमाने पर बिकते हैं। यह बिक्री अर्थव्यवस्था की गति तय करती है। 


बाजार क्यों सूने पड़े हैं? इसका कारण कोई एक नहीं है। सबसे बड़ा कारण तो पिछले साल की नोटबंदी है, जिससे पैसे का उन्मुक्त बहाव रुक गया। वह धन, जो ऐसे अवसरों पर बाजार में आता था, अब उपलब्ध नहीं हैं। नोटबंदी के दौरान कारोबारियों-व्यापारियों ने अपने अतिरिक्त धन के अलावा बिजनेस में काम आने वाले पैसों को भी बैंकों में डाल दिया, जिससे बाजार में धन की भारी कमी आ गई। छोटे और मंझोले उद्योगों को जो धक्का लगा, उससे वे अब तक उबर नहीं पाए हैं। लाखों लोग जो बेरोजगार हुए, वे अभी तक पूरी तरह से काम नहीं पा सके हैं।


नोटबंदी के कारण लोगों ने भी खरीदारी कम कर दी। पैसे का चक्र रुक गया। बहुत बड़ी तादाद में व्यापारियों-कारोबारियों ने अपने काले धन को सफेद कर लिया। अब वह पैसा बैंकों में पड़ा हुआ है और उसके बाहर आने में समय लगेगा। बाजार से तरलता गायब हो चुकी है और अब उसमें भी वक्त लगेगा। यह एक साधारण सी बात है कि लोग खरीदारी तभी करते हैं, जब उनके पास कुछ अतिरिक्त धन होता है और भविष्य के प्रति कोई शंका नहीं होती है। सरकार भले ही काले धन को सिस्टम से निकालना चाहती है, लेकिन सच यह है कि यह अर्थव्यवस्था का हिस्सा है और अक्सर बाजार में तेजी लाने में में यह मददगार रहा है।याद कीजिए 2008 की विश्वव्यापी मंदी। भारत उससे अछूता रह गया, क्योंकि काले धन ने वह काम कर दिया, जो सफेद करता। अब अगर सरकार अपने लाखों कर्मचारियों को बोनस दे या पुराना बकाया दे, तो फिर हालात थोड़े बदल सकते हैं। 


दिवाली में कपड़ों के अलावा सोना-चांदी खरीदने का खूब रिवाज है। लेकिन इस बार सर्राफा बाजारों में सन्नाटा-सा है। नोटबंदी के दौरान तो करोड़ों-अरबों रुपए का सोना बिका। लेकिन अभी बड़े-बड़े और भव्य शोरूम ग्राहकों के लिए तरस रहे हैं। जीएसटी ने भी काफी संशय पैदा किया है। स्वर्णकारों के सामने अजीब स्थिति रही, क्योंकि जीएसटी में कई तरह के स्लैब थे, जिससे परेशानी पैदा हो रही थी। मसलन खालिस सोने पर अलग दर तो हीरे जड़े गहनों पर अलग। अब सरकार ने जीएसटी की दरों में काफी बदलाव किया है जिससे यह समस्या खत्म हो गई है। इतना ही नहीं 50,000 रुपए तक की खरीदारी पर पैन कार्ड की अनिवार्यता खत्म करके यह सीमा काफी ऊपर कर दी गई है। इससे लोगों को राहत मिली है। इन सबका असर देखने को मिल सकता है। उधर कपड़े पर जीएसटी लग जाने से व्यापारी हैरान हैं, क्योंकि उनके काम करने का तरीका बदल गया है। अब उन्हें कई तरह के फॉर्म भरने हैं और जीएसटी का हिसाब-किताब रखना है। इससे उनके उन्मुक्त कारोबार में बाधा आई है। 


लेकिन परंपरागत बाजारों को पिछले कुछ वर्षों से ऑनलाइन विक्रेताओं से जबर्दस्त टक्कर मिल रही है। इस खेल के दो बड़े खिलाड़ियों विदेशी कंपनी अमेजन और फ्लिपकार्ट ने बिक्री के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस दिवाली में उन दोनों ने अब तक दो सेल ऑफर में 52,700 करोड़ रुपए की बिक्री दर्ज कर ली। अभी उनकी दिवाली सेल चालू है। इन दो बड़े खिलाड़ियों के अलावा दर्जनों और भी ऑनलाइन खिलाड़ी हैं, जो लगातार आक्रामक ढंग से ग्राहकों को रिझा रहे हैं। इन सभी का परंपरागत बाजारों पर असर पड़ा है, क्योंकि इनकी बिक्री हर साल बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका की तरह आने वाले कुछ वर्षों में ये दुकानों, बाजारों वगैरह को टक्कर देने लगेंगे

। 

कई राज्यों में आई बाढ़ के कारण भी बिक्री पर असर पड़ा है। इस साल दिवाली कुछ पहले भी आ गई और इस वजह से किसान खरीदारी से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें अंदाजा नहीं मिल पा रहा है कि फसल कैसी होगी। अभी तक के अनुमानों से पता लगता है कि मानसून अपना कोटा पूरा नहीं कर पाया है। इसका असर देश के कई इलाकों में देखने में आ रहा है। 
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जनता के दबाव पर सरकार ने 27 वस्तुओं पर जीएसटी कम कर दिया है। इसके अलावा भी छोटे और मंझोले उद्योगों को राहत दी है। निर्यातकों को रिफंड देने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। इन सभी का असर बाजारों में ठीक दिवाली के पहले देखने को मिल सकता हैं। व्यापारियों-निर्यातकों को टैक्स रिफंड मिलने से उनसे जुड़े लाखों छोटे उद्यमियों को राहत मिल सकती है, जिसका असर अंततः खरीदारी के रूप में देखने को मिल सकेगा। लेकिन फिलहाल बाजार में कोई उत्साह नहीं है। 
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