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आमंत्रित मेहमान हो गया है सूखा

Sat, 13 Apr 2013 10:21 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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राजनीतिक वर्ग और मीडिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एवं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच अपनी छवि को चमकाने के लिए चल रहे अघोषित युद्ध को लेकर सम्मोहित हैं। लेकिन देश भर में एक और जंग छिड़ी हुई है, वह है पानी को लेकर मारामारी। इसके चलते लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर है।
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महाराष्ट्र पिछले 40 वर्षों के दौरान सबसे भयानक सूखे का सामना कर रहा है। राज्य का तकरीबन एक तिहाई हिस्सा इससे प्रभावित है। गर्मी दस्तक दे चुकी है और गुजरात में पानी की कमी राजनीतिक तापमान को बढ़ा रही है। कई अन्य राज्यों - हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, आंध्र प्रदेश और केरल में भी सूखे की आशंका बनी हुई है। बुंदेलखंड में पानी की कमी पहले से ही एक बड़ी समस्या है।

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ यह अर्द्ध शुष्क इलाका है। हैदराबाद के प्रतिष्ठित उस्मानिया विश्वविद्यालय के विद्यार्थी छात्रावास में पानी की किल्लत को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। पानी की अपनी मांग को लेकर तमिलनाडु के मदुरै में भी लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। हालत यह है कि इस सप्ताह यह भी रिपोर्ट आई है कि एक आदमी ने पीने के पानी को लेकर हुए झगड़े के कारण एक महिला के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
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मार्च में केंद्र ने सात सूखा प्रभावित राज्यों के लिए 2,892 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी, जो हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा है। कई अन्य राज्य जल्द ही केंद्रीय सहायता की मदद की गुहार लगा सकते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे इलाकों में भले ही अभी पानी की किल्लत नहीं है, लेकिन भूजल की गुणवत्ता वहां भी एक अहम मुद्दा है। हमारा देश वर्षों से पानी की किल्लत का सामना कर रहा है, लेकिन प्राधिकारियों ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। अगर तत्काल प्रभाव से व्यापक कदम नहीं उठाए गए, तो हालात भयावह हो सकते हैं।

इसके अलावा अगर मानसून कमजोर रहा तो स्थिति और भी बदतर हो सकती है। पानी की कमी और संदूषित पानी से डायरिया और जल-जनित अन्य बीमारियां होने का खतरा रहता है। देश के कई हिस्सों में लगातार सूखा और कृषि आय में कमी के चलते बड़े पैमाने पर पलायन और महिलाओं की तस्करी के मामलों को बढ़ावा मिलता है। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि जल प्रदूषण इंसानी गलतियों का नतीजा है और प्रकृति का इस्तेमाल बलि के बकरे की तरह नहीं किया जा सकता।

इस साल करोड़ों लोग पानी की किल्लत का सामना क्यों कर रहे हैं? लाखों लोग पीने के पानी के लिए टैंकरों पर क्यों निर्भर हैं? इस साल और पिछले वर्षों में इस भयानक संकट का मुख्य कारण भूजल के उपयोग के नियमों की व्यापक उपेक्षा ही है। द साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम, रीवर्स एंड पीपुल ने बताया है कि महाराष्ट्र में 2012-13 का सूखा, जल प्रबंधन की असफलता से उपजी आपदा है।

भ्रष्टाचार और सूखे को लेकर संवेदनशील इलाकों में ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों को उपजाने की प्रवृत्ति के चलते ये हालात पैदा हुए हैं। यह बात लोगों को अच्छी तरह से पता है कि सूखा प्रभावित जिलों में राज्य सरकार ने गन्ने की खेती और चीनी मिलों व शराब बनाने वाले संयंत्रों को हतोत्साहित करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। एक अनुमान के मुताबिक चीनी मिलें रोजाना 90 लाख लीटर पानी का इस्तेमाल करती हैं।

एक एकड़ गन्ने की उपज के लिए जितने पानी की जरूरत होती है उतने से ज्वार जैसी खाद्यान्न फसलों के 10-12 एकड़ की सिंचाई की जा सकती है। महाराष्ट्र में लोगों के उपभोग के लिए सरकार द्वारा खोदे गए कुएं के 500 मीटर के क्षेत्र मेंे किसी बोरवेल की खुदाई पर प्रतिबंध है। लेकिन आंखों देखी रपटों में बताया गया है कि गांवों के सम्पन्न लोग, गन्ने की खेती करने वाले और मिलों के प्रबंधक, अंगूर व संतरों के बागवान और उद्योगों द्वारा इस नियम की खुलेआम धज्जियां उड़ा दी गई हैं।

केंद्रीय भूजल बोर्ड वर्षों से कह रहा है कि भूजल निकासी को हर हाल में नियंत्रित किया जाना चाहिए। कृषि मंत्रालय ने 2012 की अपनी संकट प्रबंधन योजना में कहा है कि सूखा कोई आपदा नहीं है, बल्कि प्रबंधन से जुड़ा मसला है। लेकिन सभी रिपोर्टों में बताया गया है कि भूजल की निकासी कुप्रबंधन का मुद्दा बन चुका है। संबंधित अधिकारियों को नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करवाना होगा और जलस्तर को दुरुस्त करने के लिए हम सभी को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। लेकिन यह सब कैसे होगा?

इन दिनों, हममें से बहुत से लोग जल संचयन तकनीकों की समृद्ध परंपरा से अनजान हैं या कम से कम उसके इस्तेमाल को लेकर इच्छा नहीं दिखाते। एक आसान काम है, जो हम अपने घर पर और आस-पड़ोस में कर सकते हैं। मैं भाग्यशाली हूं कि एक ऐसे अपार्टमेंट में रहती हूं, जहां वर्षा जल के संचयन का काम होता है। इसका देशभर में प्रसार करना कोई कठिन काम नहीं है। यह अच्छी बात है कि तमिलनाडु सरकार ने सभी नए भवनों के लिए वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बना दिया है। केरल ने भी इस दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है, पर बाकी राज्य क्यों चुप बैठे हैं?
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