यह लेख मैं न्यूयॉर्क में लिख रही हूं। बाहर बर्फ गिर रही है। आज सुबह जब मैं यहां के सेंट्रल पार्क में जॉगिंग करने निकली, तो देखा के हर पेड़, हर रास्ते पर बर्फ की चादर छा गई थी। न्यूयॉर्क विश्व की राजधानी मानी जाती है, क्योंकि यह सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश का सबसे शक्तिशाली महानगर है और इस महानगर में दुनिया के तकरीबन हर देश से आकर लोग बस गए हैं। भारतवासी भी बहुत हैं यहां। शायद ही यहां कोई दुकान, दफ्तर या रिहाइशी इलाका होगा, जहां आपको भारतीय मूल के लोग नहीं मिलेंगे।
मुझे अपने इन देशवासियों को देखकर खुशी नहीं, दुख होता है, क्योंकि यहां आए अधिकतर लोग ऐसे हैं, जिन्हें हम आर्थिक शरणार्थी कह सकते हैं। भारत में नौकरियों के अभाव के कारण वे यहां आते हैं और कोई भी छोटी-मोटी नौकरी करने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि छोटी-मोटी नौकरियों में भी यहां इतना वेतन मिलता है, जितना हमारे देश की बड़ी-बड़ी नौकरियों में नहीं मिलता। कहने को न्यूनतम वेतन हमारे देश में भी है, पर यहां न्यूनतम वेतन कम से कम इतना तो होता है, जिससे इंसान इज्जत के साथ रहने के काबिल बन सके। अफसोस के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि ऐसा अपने देश में नहीं है। सो अपने देश में जो लोग घरेलू नौकरियां करने पर मजबूर होते हैं, वे जिंदगी भर की मेहनत के बाद शायद अपने गांव में एक छोटा-सा मकान बना पाते हैं। या उनका मालिक बहुत मेहरबान होता है, तो वे मुंबई या दिल्ली की किसी झुग्गी बस्ती में बस जाने के काबिल हो जाते हैं। लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं है। कुछ ही वर्ष की मेहनत के बाद न्यूयॉर्क के किसी बाहरी क्षेत्र में मकान खरीदा जा सकता है। एक अजीब सच यह भी है कि रोजमर्रा की अन्य आवश्यक चीजें अमेरिका में भारत से सस्ती मिलती हैं। सो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए आपको अगर मैं कहूं कि इस बार मुझे पढ़े-लिखे भारतीय नौजवान मिले, जो न्यूयॉर्क के रेस्टोरेंट्स में वेटर का काम करते हैं या नौजवान लड़कियां न्यूयॉर्क के अमीर नागरिकों के लिए आया का काम करती हैं। भारत की ये बेटियां सर्द सुबह को गोरे बच्चों को गाड़ियों में घुमाती हुई दिखती हैं। न्यूयॉर्क की पटरियों पर दुकान लगाकर कुछ न कुछ बेचते हुए भारतीय दिखते हैं।
इनको देखकर मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह भाषण याद आया, जो उन्होंने कुछ वर्ष पहले पेरिस में भारतीयों को संबोधित करते हुए दिया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनका सपना भारत को ऐसा देश बनाना है, जहां रोजगार के इतने अवसर हों कि हमारे नौजवानों को गैर देशों में रोजगार ढूंढने न जाना पड़े। मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने निस्संकोच ऐसी बात कही, लेकिन उसके बाद या तो वह अपनी यह बात भूल गए हैं या भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार लाना इतना आसान नहीं है, जितना उन्होंने सोचा था। यह बात सोचते हुए याद आया कि मोदी के दौर में कई क्षेत्रों में सुधार हुए हैं। स्वच्छ भारत अभियान काफी कामयाब रहा है, बेटियों को बचाने का एहसास काफी हद तक आम लोगों को होने लग गया है। उनकी कई अन्य सफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। मोदी सरकार के इस कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट पेश किया जा चुका है और इस सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक विफलता रोजगार के क्षेत्र में रही है। रोजगार के मोर्चे पर अगर अगले लोकसभा चुनाव से पहले कुछ फर्क दिखता है, तो 2019 में मोदी की जीत तय है।