डॉ. कपिला वात्स्यायन भारतीय ज्ञान परंपरा और कला परंपरा की विश्वविश्रुत, संसार-प्रसिद्ध विदुषी थीं। उन्होंने समूची भारतीय ज्ञान परंपरा और कला परंपरा को पुन: स्थापित करने और उसकी समूची व्याख्या के लिए अपना जीवन समर्पित किया। श्रीपाद लक्ष्मण शास्त्री जोशी और प्रोफेसर शिव राम मूर्ति जैसे महान विद्वानों के साथ विचार-विमर्श कर उन्होंने एक ऐसी श्रृंखला स्थापित की और महान ग्रंथों का संपादन, अनुवाद तथा व्याख्या की, जिससे भारतीय संस्कृति पर नया प्रकाश तो पड़ा ही, उसका फिर से हमको अनुशीलन करने का नया मार्ग मिला। उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की स्थापना ही नहीं की, देश की बहुत सारी संस्थाओं का मार्गदर्शन भी किया।
उनकी सांस्कृतिक यात्रा नृत्य से शुरू हुई, जिसमें ओरिएंटल नृत्य से लेकर कथक, भरतनाट्यम और मणिपुरी तक शामिल रहे। तब वह कोलकाता में थीं। उनका परिवार राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ा था। फिर वे लोग दिल्ली आ गए। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री के बाद एक फेलोशिप के अंतर्गत वह अमेरिका गईं और संस्कृति को लेकर उन्होंने संसार को नए दृष्टिकोण से देखना शुरू किया।
उन्होंने संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया। दिल्ली में ही उन्होंने नृत्य की अलग-अलग विधाओं को समाजशास्त्रीय रूप में देखने के लिए एक सांस्कृतिक परिदृश्य की रचना की। अच्छन महाराज की मृत्यु के बाद में उनके बेटे बिरजू महाराज को लेकर वह दिल्ली आईं। उस समय बिरजू महाराज की उम्र बहुत कम थी। उन्होंने एक नृत्य विद्यालय की स्थापना की। वह पढ़ती बहुत थीं, यात्राएं बहुत करती थीं। देश की परंपरा की अनजानी चीजों को देखने-समझने और महसूस करने में उनकी गहरी रुचि थी।
कपिला जी के साथ मेरा काम करने का अवसर पिछली शताब्दी के आठवें दशक की उन स्मृतियों से जुड़ा हुआ है, जब मैं उज्जैन में कालिदास अकादमी का निदेशक था। उन्होंने वहां आकर न केवल मुझे उपकृत किया, बल्कि मेरा मार्गदर्शन किया। इसके बाद सारे जीवन और अभी तक मैं उनसे लगातार बातचीत करता रहा। एक ऐसा स्मरण है, स्मृति है, जिसे मैं इस समय जरूर साझा करना चाहूंगा।
दिल्ली में एक बहुत बड़ा अधिवेशन हो रहा था। कपिला जी के साथ आचार्य गोविंद चंद्र पांडे, आचार्य विद्यानिवास मिश्र जी जैसे देश भर के बहुत सारे विद्वान उसमें इकट्ठा हुए थे। चर्चा चल रही थी और मैंने एकाएक यह कहा कि आपने भारतीय संस्कृति के सौंदर्यशास्त्र की व्याख्या में वेदों से उसका स्रोत माना है, वह बिल्कुल ठीक है, लेकिन मुझे लगता है कि उसकी व्याख्या में नाट्यशास्त्र में केवल वेदों से ही नहीं, आगमों से भी स्रोत प्राप्त होता है।
कपिला जी का ऐसा व्यक्तित्व था कि उनके सामने कोई उनकी बातों में संशोधन कैसे करे? लेकिन मेरी बातें और तर्क सुनकर वे एक क्षण चुप रहीं और फिर उन्होंने तत्काल मेरी बात को माना। उसके बाद से मेरी उनसे निकटता और भी बढ़ गई। यह उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई थी, जिसको मैं आज भी याद करता हूं।
उनकी जैसी विदुषी के सामने भरी सभा में इस तरह बात करना और उसको तुरंत उनके द्वारा स्वीकार करना, यह बहुत बड़ी बात थी। मैं भूल नहीं पाता। फिर तो मैं लगातार 10 वर्षों तक वाराणसी में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की स्थानीय इकाई में काम करता रहा और कलाकोश के संपादन के दौरान बहुत अधिक फॉर्मूले और विचार-विमर्श का मौका मिला।
उनका दृष्टिकोण इतना व्यापक था कि उन्होंने मुझे सम्मान भी दिया और इसके साथ-साथ मुझे वह राह भी दिखाई, जिससे मैं वह काम पूरा कर सका। पिछली शताब्दी और इस शताब्दी में नाट्यशास्त्र की स्थापना का श्रेय कपिला जी को जाता है। कपिला जी की ये स्मृतियां मेरे लिए अविस्मरणीय हैं, मैं उनको भूल नहीं सकता। उनका निधन आहत करने वाला है, जिससे देश को अपूरणीय क्षति हुई है।
मैं वर्तमान क्षणों में उनके प्रति कृतज्ञतापूर्ण स्मृति से भरा हूं। उन्होंने पीढ़ियों को रास्ता दिखाया है और मैं आशा करता हूं कि देश उनको बहुत ही कृतज्ञता के साथ हमेशा स्मरण रखेगा। उनका व्यक्तित्व इतना विराट था, जिसको मैं थोड़े शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। उनके प्रति केवल अपनी विनम्र श्रद्धांजलि ही अर्पित कर सकता हूं। (लेखक सुपरिचित संस्कृतिकर्मी हैं।)