वैश्य, कायस्थ और ब्राह्मणों की तत्सम जातियां बन चुकी हैं। इसलिए उनका जाति छिपाना या दिखाना वैसा बहिष्कार नहीं है, जैसा दलित जातियों के लिए होता है। कोई उन्हें दलित न समझ ले, इसलिए अपवाद छोड़ कर गैर-दलित स्त्रियां भी डॉ. आंबेडकर के प्रति उदासीन रहती हैं। कृतज्ञ बचते हैं, दलित-अछूत।
देश में जब धर्म परिवर्तन हो रहे थे। ज्योतिबा फुले युवा थे। दलित ईसाई और मुस्लिम बन रहे थे, तब 10 अप्रैल, 1875 को स्वामी दयानंद ने लाहौर में आर्य समाज की स्थापना की थी। लाहौर में ही संतराम बी.ए. ने ‘जात-पात तोड़क मंडल’ बनाया था। दो रुपये में मिलने वाली आर्यसमाज की सदस्यता शर्त थी, अपने बच्चों की शादियां जाति से बाहर ही करेंगे।’ डॉ. आंबेडकर ने मंडल से प्रभावित होकर 1936 में लाहौर सम्मेलन के लिए अपना व्याख्यान लिखा। निष्कर्ष था ‘हिंदू धर्मग्रंथों में जाति जब तक अपौरुषेय और धार्मिक व्यवस्था मानी जाती रहेगी, तब तक वह बनी रहेगी। सहभोजन और अंतरजातीय सहजीवन पूर्ण उपचार नहीं हैं।'
एक बार गैर-ब्राह्मण नेताओं ने डॉ. आंबेडकर को प्रस्ताव दिया था, ‘यदि आप घोषणा कर दें कि बहिष्कृत हितकारिणी सभा के आंदोलन में किसी ब्राह्मण को शामिल नहीं होने दिया जाएगा, तो हम दलितों के आंदोलन को अपने खर्चे पर संचालित करेंगें।’ तब उन्होंने कहा था, ‘‘मैं किसी ब्राह्मण का विरोधी नहीं, ब्राह्मणवाद का विरोधी हूं, जो ब्राह्मण और कायस्थ नेता साथ हैं, उनकी समाज सुधार में प्रतिबद्धता है, तो वे साथ रहेंगे।' जब तिलक ने ‘स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,’ का नारा दिया था, तब डॉ. आंबेडकर ने,‘अस्पृश्यता निवारण मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,’ कहा था। दलितों के लिए अस्पृश्यतायुक्त स्वराज किस काम का था? विभूति पूजा आंबेडकर की प्राथमिकता में नहीं थी।
मुंबई क्रॉनिकल के संपादक फिरोजशाह मेहता की स्मृति के बारे में पत्र-परिवार ने आंबेडकर से राय मांगी थी, तो उन्होंने उनकी मूर्ति स्थापित करने के बजाय उनके नाम से एक समृद्ध लाइब्रेरी खोलने की राय दी थी। तिलक के सुपुत्र श्रीधर बलवंत तिलक आंबेडकर के साथ आने पर तिलक ने उन्हें केसरी की पत्रकारिता से निकाल दिया था। आंबेडकर ने उन्हें ‘समता समाज संघ‘ की पूना शाखा का उपाध्यक्ष बनाया था। बलवंत की आत्महत्या के बाद आंबेडकर ने समता पत्र उनकी स्मृति को समर्पित किया। शुक्रवार के दिन बलवंत ने आत्महत्या की थी। समता हर शुक्रवार को प्रकाशित होता था।
सभ्यता के इस विकसित युग में संस्कृतियों के समावेश और विविधता पसंद लोकतांत्रिक युग में लोग किसी जाति विशेष के प्रति इतना घृणा भाव क्यों रखते हैं? स्मरण हो, संसद के भीतर उनका चित्र और बाहर उनकी प्रतिमा की स्थापना के लिए आंबेडकरवादी संगठनों ने लंबे समय तक आंदोलन किए थे। आज स्वयं सरकार पंचतीर्थ यानी विश्व स्तर के पांच स्मारक विकसित करने का श्रेय प्राप्त कर चुकी है। लंदन स्मारक शिक्षा भूमि, नागपुर दीक्षा भूमि, मुंबई चैत्यभूमि, मऊ शोध संस्थान जन्म भूमि, 24 अलीपुर परिनिर्वाण भूमि और आंबेडकर इंटरनेशनल मेमोरियल।
परंतु समावेशी समाज सुधार तो अभी अधर में ही है। 24 सितंबर, 1924 को मुंबई में भय मुक्त सामाजिक न्याय और मानव गरिमा की सुरक्षा हेतु एक स्वयंसेवी संस्था ‘अखिल भारतीय समता सैनिक दल’ की स्थापना की गई। कमांडर इन चीफ थे भीमराव आंबेडकर। 1927 में हुए चावदार तालाब जल आंदोलन के समय ‘समता सैनिक दल’ ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने स्वयं प्रशिक्षण व हिदायत दी कि समता सैनिक न तो किसी पर हमला करेंगे और न कोई हिंसा किंतु अपने बचाव और मानव गरिमा की रक्षा जरूर करेंगे। सामाजिक उत्पीड़न, हिंसा और अन्याय से आत्म रक्षार्थ ‘समता सैनिक दल’ पुनः प्रासंगिक हो रहा है। 2024 में इसका शताब्दी वर्ष है। आज दलित महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के लिए कांग्रेस काल से लंबित हर जनपद में ‘दलित महिला आयोग’ बनाने की आवश्यकता है और महिला सैनिकों में दलित बालिकाओं की भर्ती होना अपेक्षित है।
-लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।