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दानी की पहचान धन से नहीं होती

Thu, 29 Nov 2012 10:28 PM IST
शिवकुमार गोयल
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बड़ा दानी किसे माना जाए, इसे लेकर हमारे धर्मग्रंथों में कई प्रसंग हैं। उन प्रसंगों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन के हिसाब से कोई छोटा या बड़ा दानी नहीं होता है, बल्कि दान देने वाले की भावना महत्वपूर्ण है। बेमन से किए गए दान से पुण्य अर्जित नहीं किया जा सकता।
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एक बार ईसा मसीह एक धर्मस्थल में बैठे हुए थे। उन्होंने देखा कि नगर के धनी भक्तजन पास में रखे दानपात्र में सिक्के डालते तथा उनकी ओर गर्व से देखकर चरणों में बैठ जाते। इसी बीच एक दरिद्र-सी दिखाई देने वाली महिला आई और दानपात्र में दो सिक्के डालकर चुपचाप वहां से चली गई। उसने ईसा मसीह की ओर देखा भी नहीं।

ईसा ने सामने बैठे शिष्यों से पूछा, तुम्हारी निगाह में सबसे बड़ा दानी कौन होता है? एक शिष्य ने उत्तर दिया, जो सबसे ज्यादा धन देता है, उसे ही निर्विवाद रूप से सबसे बड़ा दानी मानना चाहिए। ईसा ने कहा, तुम्हारी यह सोच गलत है। जो धनी है, जिनके पास आवश्यकता से ज्यादा धन है, वे ज्यादा धन दान में देते हैं, तो इसमें क्या खास बात है।
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असली दानी तो वह महिला थी, जिसने गरीब होते हुए भी अपनी दिन भर की मजदूरी से प्राप्त सिक्के ही दानपात्र में डाल दिए और घमंड से किसी की ओर देखा भी नहीं। चुपचाप सिक्के डालकर चली गई। यह करुण हृदय महिला दूसरों के मुकाबले में कहीं ज्यादा पुण्यात्मा तथा प्रभु कृपा की अधिकारी है। शिष्यों के अंतर्चक्षु खुल गए थे।
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