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खरा नहीं है नकद का सौदा

Wed, 28 Nov 2012 11:25 PM IST
रीतिका खेड़ा
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संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की हालिया घोषित योजना नकद सबसिडी को लेकर तीन तरह के भ्रम हैं। पहला यह कि प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण का वास्तव में क्या मतलब है? दूसरा, अकसर बताया जाता है कि ब्राजील और मैक्सिको में ऐसी योजनाओं का सफल क्रियान्वयन हुआ है, लेकिन यह जानने की जरूरत है कि वहां इसके क्या अनुभव रहे हैं। तीसरा यह कि मीडिया रपटों में कहा जा रहा है कि 2014 के आम चुनाव को ध्यान में रखकर सरकार ने यह कदम उठाया है।
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सवाल यह है कि इस योजना के जरिये क्या सरकार वाकई में मतदाताओं का दिल जीतने में कामयाब हो सकेगी। क्या गरीबी और महंगाई से जूझ रही जनता 2014 में इसी सरकार को मौका देगी? प्रधानमंत्री की घोषणा को ध्यानपूर्वक समझने से लगता है कि मौजूदा प्रक्रिया को दोबारा व्यवस्थित करने की इस योजना का वोट जुटाने के मामले में उलटा असर भी हो सकता है।

पहले सवाल की ही बात करें कि प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण का इस सरकार के लिए क्या मायने हैं? दरअसल मौजूदा नकद हस्तांतरण योजनाओं, जैसे छात्रवृत्ति, पेंशन, मनरेगा की मजदूरी को दोबारा व्यवस्थित करके इसे प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण नाम दिया गया है। ज्यादातर मामलों में यह रकम पहले से ही लाभार्थियों के बैंक खाते में भेजी जा रही है।
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लिहाजा सिर्फ आधार कार्ड को बैंक खाते से जोड़ने के अलावा इसमें नया कुछ नहीं है। वहीं, केरोसीन और रसोई गैस के मामले में प्रस्ताव है कि इन उत्पादों पर सबसिडी नहीं दी जाएगी, बल्कि लोग इन्हें बाजार भाव पर खरीदेंगे। इसकी जगह सबसिडी की रकम लोगों के बैंक खातों में पहुंचा दी जाएगी।

पायलट परियोजना के तहत राजस्थान के अलवर जिले के कोटकासिम में यह योजना शुरू हुई, जहां उपभोक्ताओं को एक लीटर केरोसीन के लिए 15 की जगह 50 रुपये देने पड़े, और 35 रुपये की सबसिडी लोगों के बैंक खाते में जमा कर दी गई। यह अलग बात है कि वहां के अनेक उपभोक्ताओं ने केरोसीन खरीदना बंद कर दिया, क्योंकि उनके पास बैंक खाते नहीं थे, जिनमें सबसिडी की रकम जाती।

इस तरह केरोसीन की खरीद में गिरावट आई और प्रचारित यह किया गया कि नई प्रणाली से किस तरह सबसिडी के दुरुपयोग को रोका गया है। यह उदाहरण बताता है कि प्रस्तावित योजना आपूर्ति प्रक्रिया में सुधार की गारंटी नहीं है,  इसके बजाय यह लोगों को सुविधाओं से वंचित कर मौजूदा प्रणाली को ही ध्वस्त कर सकती है।

ब्राजील के उदाहरण से और साफ होगा कि नकद हस्तांतरण वास्तव में है क्या? वहां की इस तरह की योजना, बोलसा फैमिलिया, को यहां बहुत महत्व दिया गया है। यह योजना वस्तुतः ब्राजील की कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में से एक है, जिसे लागू करने का उद्देश्य मौजूदा सार्वजनिक सेवाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना था। गौरतलब है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में ब्राजील की सरकार अब सबसिडी वाले खाद्यान्न की वही प्रणाली लागू करने जा रही है, जिसे अपने देश में खत्म किया जा रहा है! दरअसल, वहां कानूनी रूप से हर नागरिक स्वास्थ्य, शिक्षा और भोजन की उपलब्धता का पात्र है।

ब्राजील से हमारी कोई तुलना नहीं है। वहां गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की तादाद काफी कम है, शहरी आबादी काफी अधिक है और तकरीबन सभी लोग साक्षर हैं। क्रय शक्ति समता को अगर पैमाना मानें तो वहां 10 फीसदी से भी कम लोग गरीबी रेखा के नीचे आते हैं। जबकि भारत में यह आंकड़ा 20 से 42 फीसदी के बीच है। इसके अलावा ब्राजील की कुल आबादी का 85 फीसदी नगरों में है, जबकि अपने देश में यह महज 30 फीसदी है। शहरी आबादी ज्यादा होने के कारण ब्राजील में लोगों को पर्याप्त बैंक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसलिए बोलसा फैमिलिया की सफलता को लेकर हैरान होने की जरूरत नहीं है।

सवाल यह है कि क्या संप्रग सरकार द्वारा लागू की जा रही इस योजना में चुनाव जिताने की क्षमता है। मीडिया रपटों के मुताबिक, सरकार मानती है कि उसका यह कदम खेल बदलने वाला साबित होगा। बिलकुल वैसे ही, जैसे मनरेगा ने इसके पहले कार्यकाल की तसवीर बदल दी थी। लेकिन मानना थोड़ा कठिन है कि यह योजना 2014 में संप्रग सरकार के लिए वोट हासिल करने में मददगार साबित हो सकेगी। वजह यह कि ज्यादातर योजनाएं, जो आधार कार्ड से जोड़ी जा रही हैं, वे पहले से ही अस्तित्व में हैं, जिनमें लोगों को पेंशन के रूप में नकद या सबसिडी के रूप में केरोसीन प्राप्त हो रहा है।
 
कुछ लोगों का तर्क है कि इसे आधार से जोड़ने पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकेगा। लेकिन यह इसलिए बहुत मायने नहीं रखता, क्योंकि पेंशन योजनाओं में गड़बड़ी के मामले वैसे भी बहुत कम हैं। बल्कि प्रस्तावित योजनाओं को आधार के जरिये जोड़ने की प्रक्रिया में बैंकों की कम उपलब्धता, भीड़-भाड़ और अन्य दिक्कतों की वजह से लोगों को काफी तकलीफ उठानी पड़ सकती है।

मनरेगा और पेंशन को आधार से जोड़ने का सरकार का यह प्रस्ताव हास्यास्पद ही ज्यादा है। यह सर्वविदित है कि बुजुर्गों और शारीरिक श्रम करने वालों के लिए बायोमीट्रिक सत्यापन को लेकर अकसर अनेक समस्याएं सामने आती हैं। यह बात अविश्वसनीय लगती है कि पेंशन के भरोसे जिंदगी काटने वाले बुजुर्ग इन समस्याओं से व्यथित नहीं होंगे।

इसके अलावा उन्हें यह समस्या चुनाव के ठीक पहले उठानी पड़ सकती है। संप्रग सरकार के नकद हस्तांतरण कार्यक्रम का मीडिया में प्रचार-प्रसार 2004 चुनाव के पहले राजग के 'इंडिया शाइनिंग' की याद दिलाता है, और यह इस सरकार के आम आदमी से दूर होने का एक संकेत है।
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लेखिका आईआईटी, दिल्ली से संबद्ध हैं
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