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कोरोना की अनदेखी न हो

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Fri, 28 Feb 2020 06:53 PM IST
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चीन में कोरोना वायरस - फोटो : a

हिंसा की खबरों और सांप्रदायिक आवेग के बीच, जिसने भारत के बहुलतावादी ताने-बाने को खत्म करने का खतरा पैदा कर दिया है, यह भूलना आसान है कि हम दूसरे मोर्चे पर भी बहुत कमजोर हैं। रोगाणु सीमाओं की परवाह नहीं करता। मध्य चीन के वुहान में शुरू हुआ और तेजी से फैल रहा नया कोरोना वायरस या कोविड-19 के प्रकोप ने हजारों चीनी नागरिकों को संक्रमित किया है, यह 45 से ज्यादा देशों में फैल चुका है और पहले ही दो हजार से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है।



ऐसा लग सकता है कि उसने भारत को अपेक्षाकृत उस तरह से प्रभावित नहीं किया है। अब तक देश में मौजूद नागरिकों में से केवल केरल के तीन छात्रों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि की गई है। इन तीनों को भी अब अस्पताल से छुट्टी मिल गई है और वे स्वस्थ बताए जा रहे हैं, लेकिन देश के कई हिस्सों में कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली और अप्रभावी निगरानी को देखते हुए मामले का पता लगाना आसान नहीं है और यह समय ही बताएगा कि क्या हमने बीमारी के बोझ को ठीक ही कम करके आंका है। संक्षेप में कहें, तो मौजूदा हालात से संतुष्ट होने की जरूरत नहीं है।


ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के ताजा शोध पत्र में बताया गया है कि केरल (जहां तीन मामलों की पुष्टि हुई और कोविड-19 के संक्रमण का पता चला) स्थिति से निपटने के लिए संभवतः बेहतर ढंग से चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित है, अन्य राज्यों को इससे काफी कुछ सीखने की जरूरत है। 'द कोविड-19 सिचुएशनः हाउ इज केरला डीलिंग विद द नोवल कोरोना वायरस' नामक इस शोध पत्र के प्रमुख लेखक ओमेन कुरियन कहते हैं, 'भारतीय जलवायु और वायु प्रदूषण के स्तर को देखते हुए देशभर में फैले श्वसन संबंधी सामान्य रोगों से श्वसन संबंधी इस रोग को फर्क करना आसान नहीं।' यह सच है कि ऐसे संकेत हैं कि उच्च तापमान नए वायरस के संचरण को धीमा कर सकता है, इसलिए भारत में इसका प्रसार देरी से हो सकता है।


ओआरएफ के शोध पत्र में बताया गया है कि 'हालांकि व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान ने अक्सर प्रकोपों को लेकर मीडिया के दबाव में बिना सोचे-समझे त्वरित प्रतिक्रिया दी है, जैसा कि निपाह के मामले में देखा गया था, जहां इसे दुर्भाग्य से भारतीय अनुसंधान संस्थानों के विदेशी सहयोगियों के मत्थे डालकर दबा दिया गया।' इस संदर्भ को देखते हुए कोविड-19 के मामले में केरल की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय रही। केरल ने निपाह के संक्रमण के समय में भी प्रशंसनीय कार्य किया था। मगर नए कोरोना वायरस के संक्रमण के समय केरल क्या कर रहा है?


ओआरएफ की रिपोर्ट बताती है कि केरल रोजाना अलग वार्ड, जांच एवं मरीजों की भर्ती के संबंध में रिपोर्ट प्रकाशित कर रहा है। जो तीन छात्र संक्रमित हुए थे, वे अब खतरे से बाहर हैं। हालांकि अस्पताल और समुदाय, दोनों जगह संदिग्ध मरीजों को अलग रखने का प्रयास सक्रिय रूप से जारी है। इस समय देश के 34 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों में 11,500 लोगों को सामुदायिक निगरानी में रखा गया है, जिनमें से करीब एक तिहाई अकेले केरल में हैं।


अस्पतालों में अलग वार्ड में रखे गए संदिग्ध मरीजों में से कई को छुट्टी दे दी जाती है और उन्हें सामुदायिक निगरानी में भेज दिया जाता है, क्योंकि जांच के परिणाम नकारात्मक होते हैं और रोग के लक्षण कम हो जाते हैं। ओआरएफ की रिपोर्ट बताती है कि बीती सात फरवरी को केरल सरकार ने कोविड-19 के तीन मामलों के मद्देनजर पूर्व में जारी की गई 'राज्य आपदा' चेतावनी को वापस ले लिया है, क्योंकि सक्रिय निगरानी के बावजूद संक्रमण के किसी नए मामले का पता नहीं चला है।


कोविड -19 के प्रभाव जानने के लिए भारत सरकार को अलग वार्डों और परीक्षणों पर नियमित रूप से राज्य-वार आंकड़े जारी करने चाहिए, जिसे वह रोजाना इकट्ठा करती है, ताकि मीडिया अटकलों से बचा जा सके। ओआरएफ की रिपोर्ट बताती है कि निपाह और अब कोविड -19 के मामले में केरल सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या को हल करने के लिए केंद्र सरकार को एक सांचा प्रदान करता है। तार्किक रूप से कहा जा सकता है कि मुख्य रूप से साक्षर आबादी होने के कारण केरल को बहुत फायदा होता है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित संदेशों को प्रसारित करने में आसानी होती है। लेकिन केरल के पास बेहत स्वास्थ्य प्रणाली भी है। केरल ऐसे संकटों से निपटने के लिए तैयार है, क्योंकि उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था संकट की स्थिति न रहने पर भी बेहतर ढंग से काम करती है।
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मगर केरल ही एकमात्र राज्य नहीं है, जिसका संपर्क चीन से है। उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में बेशक अभी संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन उन पर निगरानी रखने की जरूरत है। चीन के साथ उसका भी संपर्क है। कोरोना वायरस के प्रकोप ने उत्तर प्रदेश के रेशम और कढ़ाई व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस महामारी ने जनवरी से ही रेशम उद्योग को चीन से होने वाली कच्चे माल की आपूर्ति में बाधा डाली है, जिससे निर्माताओं की परेशानी बढ़ गई है। चीन में फैली इस महामारी के कारण भारत में दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हो गई है और यह भारत के दवा निर्माण उद्योग के लिए भारी संकट पैदा कर रहा है। भारत सस्ती जेनरिक दवाओं के निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे माल की खातिर चीन पर निर्भर है। पिछले एक पखवाड़े में केंद्र सरकार और देश के दवा उद्योग के प्रमुख प्रतिनिधियों के बीच इस समस्या के समाधान के लिए कई बैठकें हुई हैं। नया कोरोना वायरस सभी आकस्मिकताओं के लिए तैयार रहने की जरूरत के बारे में कई तरह से चेतावनी की घंटी है। हम उस संदेश की अनदेखी करके अपने लिए जोखिम मोल रहे हैं।

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