लोग हाथ धोकर नहीं, बल्कि नहा-धोकर उनके पीछे पडे़ थे। वह दहाड़ मारकर रो रहे थे। मतदाता उनका मुंह नहीं देखना चाहते थे, लेकिन वह फिर से चुनाव जीतना चाहते थे। उन पर दबंगई सहित अनेक आरोप थे। करोड़ों की जमीन कौड़ियों के भाव खरीदने का गंभीर आरोप था। लोग उनके कपड़े फाड़ना चाहते थे, मगर न जाने क्या सोचकर रुक जाते थे।
उन्होंने घोषणा कर दी, चाहे उनके कपड़े फाड़ो या बैनर उतारो, मगर एक बार वोट देकर फिर संसद में पहुंचा दो। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह आत्महत्या कर लेंगे। मतदाताओं का स्पष्ट मत था कि नेता जी नाटक कर रहे हैं। नेताजी पब्लिक को आगाह कर रहे थे कि ‘लहर’ को ठहरकर देखो। क्या पता उसके पीछे ‘कहर’ हो। पब्लिक कह रही थी कि भले ही जलजला आ जाए, आपको वोट नहीं देंगे!
मैंने आंसू पोंछने के लिए रूमाल दिया, तो वह संयत होकर बोले, आप ही बताइए, मेरा हक छीनकर कोई कैसे सुखी रह सकता है। घोषणाएं करना और उन पर अमल न करना हर नेता का हक होता है। चुनाव लड़ना और जीतना हमारी रोजी-रोटी है। कोई भी व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी दांव पर कैसे लगा सकता है। यह हमारा पुश्तैनी धंधा है। हर नेता का बेटा इसी धंधे को अपनाता है। यदि हम पांच साल में सारे वायदे पूरे कर देंगे, तो फिर कैसे चुनाव जीतेंगे। इन्हीं मतदाताओं ने हमें संसद में पहुंचाया था। उनका नारा था, नेताजी की जीत, हमारी जीत है। इन्हें अपने कथन पर कायम रहना चाहिए और कहना चाहिए कि नेता जी की समृद्धि हमारी समृद्धि है। नेताजी के स्वास्थ्य में वृद्धि हमारे स्वास्थ्य में वृद्धि है। मतदाता ईमानदारी का परिचय नहीं दे रहे हैं।
मुझे लगा उनकी बातों में दम है। धीमी गति से क्षेत्र का विकास करवाना हर नेता का हक बनता है। क्षेत्र को पिछड़ा बनाए रखने से नेताओं की रोजी रोटी चलती है। किसी को हक नहीं है कि वह उनके पेट पर लात मारे। अगर क्षेत्र का पूरा विकास हो जाएगा, तो विकास के लिए विश्व बैंक पैसा नहीं देगा। यदि विकास फंड नहीं होगा, तो उनका व्यक्तिगत विकास कैसे होगा।