हाल के वर्षों में देश के जीवन-मरण के अनेक सवाल पृष्ठभूमि में डाल दिए गए। ऐसा पहले भी होता रहा है। संसाधनों की लूट कई तरह से बढ़ी। इसका असर दूरस्थ भारत में सबसे ज्यादा पड़ा। हिमालय, गंगा तथा पर्यावरण ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर जमीन, पानी और जंगल से जुड़े सवाल भी महत्व नहीं पा सके। नई आर्थिक नीति का दुष्प्रभाव लगातार ग्रामीण जीवन पर असर करता रहा। सड़कों के नाम पर जरूर ऐतिहासिक खुदाई हुई और पहली बार हिमालय में इतनी चौड़ी सड़कें बनाने का जोखिम उठाया गया, जिसकी पर्यावरण इजाजत नहीं देता। पेड़ों के कटान की भी अनदेखी की गई। अब चुनाव के समय पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, हिमालय, गंगा, कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों आदि की चर्चा तो राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों में जरूर है, पर गहराई और गंभीरता से नहीं।
भाजपा ने हिमालय पर राष्ट्रीय मिशन की शुरुआत जरूर की, हालांकि इसका खाका पहले बन गया था। नीति आयोग ने विगत नवंबर में हिमालयी राज्यों की एक क्षेत्रीय काउंसिल बनाने की घोषणा जरूर की, पर उसका कोई सर्व हिस्सेदारी वाला सम्मेलन कभी नहीं हो सका। इस तरह की काउंसिल पूर्वोत्तर के राज्यों में पहले से है, जो वहां के भूमिगत तथा सशस्त्र आंदोलनों को नियंत्रित नहीं कर सकी है। नीति आयोग अपने पूर्ववर्ती योजना आयोग की कम से कम एक दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण रिपोर्टें देखने-समझने का प्रयास नहीं कर सका, जिनमें बहुत गंभीरता से हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत तथा अरावली आदि पर पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक विकास तथा संसाधनों की हिफाजत के सुझाव दिए गए हैं।
अभी हिमालयी तकनीकी विश्वविद्यालय की स्थापना की बात की गई है, पर हिमालय में एक स्वायत्त संस्थान की बात पिछली घोषणा से आगे नहीं बढ़ सकी है। भाजपा ने ऐसे कार्यक्रम चलाने का आश्वासन जरूर दिया है, जिनसे हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को नियंत्रित किया जा सके, तो कांग्रेस ने पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण बनाने तथा गंगा प्राधिकरण का बजट दोगुना करने का आश्वासन दिया है। पर हिमालय, पश्चिमी घाट, विंध्य, अरावली जैसे अन्य पहाड़ी क्षेत्र तथा तमाम जनजातीय क्षेत्रों के बारे में दो राष्ट्रीय दलों के चुनाव घोषणापत्रों में ज्यादा प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र के पांच राज्यों ने गाडगिल समिति के सुझाव नहीं माने और केरल को पिछले साल उसका दुष्परिणाम झेलना पड़ा। भविष्य में गोवा को भी संकट झेलना पड़ सकता है, क्योंकि वहां बहुत अधिक खनन हो रहा है। हिमालय के मामले में अब ज्यादातर स्थानीय मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। हिमालय के विकास का मिजाज क्या हो, यह राष्ट्रीय प्रश्न है, जिसे संकीर्ण नजर से नहीं तय किया जा सकता।
सिर्फ हिमालय, गंगा, देवभूमि या पवित्र क्षेत्र की रट न हिमालय को संरक्षण देगी, न सम्मान। इससे आगे जाना होगा। भारतीय हिमालय और पश्चिमोत्तर राज्यों से चालीस से अधिक सांसद चुने जाते हैं, जो हिमालयी नीति अपनी शर्तों पर नहीं बना सकते। जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री के रूप में कुछ कठिन निर्णय हिमालय के संबंध में लिए थे, जिस कारण उन्हें हटा दिया गया था। तब हिमालय क्षेत्र के सांसद उनके पक्ष में खड़े नहीं हो सके थे। पूर्वोत्तर के पीडी राय जैसे कुछ सांसदों या प्रदीप टम्टा जैसे सांसद हिमालय में बड़े बांधों और अवैज्ञानिक खनन का निरंतर विरोध करते रहे हैं, पर केंद्र सरकार या उनकी पार्टी उनको उस गंभीरता से नहीं सुनती, जिसकी दरकार है।