दीपावली
शरद उत्सवों की ऋतु है और उन उत्सवों में दीपावली यानी ज्योति पर्व का विशेष स्थान है। वास्तव में भारतीय जीवन-दर्शन आनंदवादी है। वह जीवन और जगत में व्याप्त दुखों और विषमताओं के बीच आनंद की खोज करता है। हमारे पर्व-त्योहार भी वस्तुतः आनंद की अनुभूति के लिए किए गए आयोजन ही हैं। हमारे उत्सवों का संबंध धार्मिक प्रसंगों से तो है ही, ऋतुओं से भी है।
विशेष ऋतु में विशेष त्योहार की अपनी अलग छटा होती है। शरद ऋतु के विशिष्ट सौंदर्य का तो खैर कहना ही क्या! प्रकृति के सौंदर्य के बीच व्याप्त ज्योति पर्व की ज्योति मानव मन को सौंदर्य बोध और मूल्य चेतना से स्पंदित कर देती है।
इस उत्सव की मूल परिकल्पना है अंधेरे पर उजाले की विजय, असद् पर सद् की विजय, रावण पर राम की विजय। कहते हैं कि लंका विजय के पश्चात श्रीराम जिस दिन सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, वह कार्तिक अमावस्या का दिन था और उस रात दीपोत्सव मनाया गया। अयोध्यावासियों ने दीये जलाकर उनका स्वागत किया। यह असत्य पर सत्य की विजय के उल्लास का प्रतीक था। यानी इसमें आनंद और मूल्य-बोध, दोनों समाहित थे।
वह रात भी मामूली रात नहीं थी
दीपावली
- फोटो : Social Media
वह रात भी मामूली रात नहीं थी, बल्कि अमावस्या की रात थी-आद्यंत अंधकार की रात। लंका में व्याप्त निशाचरी अंधकार भी तो अमावस्या का ही अंधकार था-यहां से वहां तक नीरंध्र छाया हुआ...! राम ने उस अंधकार का भेदन किया था और यहां से वहां तक मूल्यों की ज्योति जगमगा दी थी। निशाचरी अंधकार में सीता बंदिनी थी।
युद्ध के द्वारा वह मुक्त की गई थीं और अयोध्या में श्री और ज्योति-सी लौटी थीं। और सिर्फ अयोध्या में ही क्यों, वह पूरी मानवीय संस्कृति में लौटी थीं। तो दीपावली का यह त्योहार श्री और ज्योति, दोनों का हो गया। यानी हर आदमी यह सोचता है कि इस त्योहार पर दीये जलाओ, उसकी रोशनी में श्री हमारे घर आएंगी। अब हुआ क्या कि दीये असद् पर सद्, तम पर ज्योति और अन्याय पर न्याय की विजय की प्रतीकात्मकता तो खो बैठे और लोगों की इस कामना के रक्षक बन गए कि उनके आलोक में उनके घर लक्ष्मी पधारेंगी।
मुझे शहर में रहते हुए जमाना हो गया
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मुझे शहर में रहते हुए जमाना हो गया, किंतु मुझसे मेरा गांव आज तक नहीं छूटा। वास्तविकता यह है कि आज भी विशेष-विशेष अवसरों पर अपने गांव जाने का मेरा बहुत मन होता है, किंतु विविध कारणों से गांव जाना संभव नहीं हो पाता। लेकिन इसका एक विकल्प मैंने तलाश लिया है। हर बार दीपावली के अवसर पर शहर की हलचल भरी भीड़भाड़ से घबरा कर मेरा मन अपने गांव चला जाता है और वहां की शालीन दीप-छवि से भर जाता है।
क्वार के महीने के अंत से ही खेतों की जुताई-बुवाई शुरू हो जाती है। मुझे अपने बचपन के वे दिन आज भी याद आते हैं। सुबह-सुबह अपने-अपने खेत की बुवाई संपन्न करके लोग आवाज देते थे-हर हर महादेव...। दीपावली तक छोटी-छोटी डीमियां जगमगा उठती थीं। आधे क्वार से लेकर दीपावली तक त्योहारों की गूंज भरी होती थी। और उसी गंज में एक गूंज थी दिवाली की। खुशनुमा मौसम, क्वार की चिनचिनाहट में उगती हुई स्निग्ध ठंडक की हल्की-हल्की दस्तक और अभावों में भी कुछ अच्छे खान-पान की आशा। यानी हर तरह से चारों ओर उगता हुआ जीवन-राग। मूल्यों से स्पंदित जीवन-राग।
अमावस्या का अंधेरा शुरू होते ही लक्ष्मी-पूजा शुरू हो जाती थी
दीपावली
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अमावस्या का अंधेरा शुरू होते ही लक्ष्मी-पूजा शुरू हो जाती थी और मिट्टी के दीयों में मां और भाभी के हाथ पूजा भाव से तेल ढारते थे। ऊष्मा भरी उंगलियों से जलती थी माचिस की एक तीली, तीली से दीया और फिर दीये से दीया जलता चला जाता था।
हम बच्चे उन्हें अपनी ही आंखों की ज्योति की तरह संभाले हुए रख आते थे घर के इस कोने में, उस कोने में, कमरे में, आंगन में, चांद पर, कुएं पर, देवस्थानों पर, डीमियों से हंसते खेतों में। देश के सीमांतों तक एक भावात्मक छवि से जगमगाते हुए स्थान स्थान से, घर घर से, गांव गांव से, गांव शहर से जुड़ते चले जाते थे। पूरी धरती एक जीवित स्वप्नलोक बन जाती थी।
अमावस की सघन विराटता को अपनी लौ से भेदते हुए नन्हे-नन्हे ये दीये सामूहिक राग में गा रहे होते थे-तमसो मा ज्योतिर्गमय। श्रेयस प्रेयस में और प्रेयस श्रेयस में समा जाता था। हम लोग गांव के बड़े लोगों को प्रणाम करते थे और उनके आशीर्वाद के सुख से भर जाते थे।
वे दिन तो रहे नहीं
पटाखा
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वे दिन तो रहे नहीं। अब तो शहर में दीपावली के नाम पर आंख मारती बिजली की यांत्रिक रंगीन लड़ियां हैं, कान फोड़ने वाले पटाखे हैं, फुलझड़ियां हैं, पैसों से भरती दुकानें हैं, खाली होते हुए लोग हैं, धुआं है, शोर है। और लक्ष्मी? अरे, यहां तो लक्ष्मी बड़े-बड़े भवनों में आती हैं-पिछले दरवाजे से चुपचाप।
मेरे तथा मेरे जैसे लोगों के लिए दिल्ली में पटाखे दिवाली का सर्वाधिक अवांछित रूप प्रकट करते हैं। दिवाली आ रही है, यह सोचकर मैं पटाखों के उत्पात से डर जाता हूं। ऐसा लगता है कि अब अगले कई दिनों तक मैं ठीक से सो नहीं पाऊंगा।
मध्यवर्गीय घरों के लोग तो दिवाली की रात कुछ देर तक ही पटाखे छोड़ते हैं, फिर शांत हो जाते हैं, लेकिन व्यापारी लोग कुछ देर रात को घर लौटते हैं, तब उनके यहां पटाखों का जो खेल शुरू होता है, वह लंबे समय तक चलता है। वे लोग हों या अन्य पटाखेबाज, वे यह नहीं सोचते कि पास-पड़ोस में कुछ वृद्ध लोग भी रहते हैं, जिनसे नींद प्रायः रूठी रहती है। नींद कठिनाई से अगर आती भी है, तो वह पटाखों के शोर से घबरा कर भाग जाती है। यानी अपनी दिवाली में लोग पड़ोसी की असुविधा का थोड़ा भी ख्याल नहीं रखते।
पटाखे बहुत स्थानों पर आग लगा रहे हैं
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पटाखे कितने स्थानों पर आग लगा रहे हैं, जिसे बुझाने के लिए दमकल की गाड़ियां बेतहाशा दौड़ती रहती हैं। यह दिवाली का आम दृश्य है। लोगों के नागरिकता-बोध को लकवा मार गया है। वे नहीं सोचते कि पटाखों का उत्पात उत्पन्न करके वे कितना स्वर प्रदूषण और कितना वायु प्रदूषण फैला रहे हैं।
सरकार पटाखों के शालीन उपयोग की बात कहा करे, रात ग्यारह बजे के बाद पटाखे न चलाने का आदेश देती रहे, लोग कहां सुनने वाले? वे तो पटाखे छोड़ेंगे ही, भले ही किसी को परेशानी हुआ करे। फिर भी दिवाली तो दिवाली है-यानी कि एक महान त्योहार।