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मतभेद की रेखाएं: अमेरिका और यूरोप के ऐतिहासिक गठजोड़ में दरार; बदलते समय की कसौटी पर परीक्षा

अमर उजाला Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 23 Jan 2026 06:36 AM IST

सार

भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप यूरोप पर 10% टैरिफ लगाने के फैसले से पीछे हट गए हों, लेकिन अमेरिका और यूरोप के बीच पुराने भरोसे में अब साफ दरारें दिखने लगी हैं। यह अविश्वास रूस-यूक्रेन युद्ध के समय से ही शुरू हो गया था, जब ट्रंप ने रूस के प्रति नरम और यूक्रेन के प्रति सख्त रुख अपनाया।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


उल्लेखनीय है कि दोनों के बीच अविश्वास का दौर तो रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ही शुरू हो गया था, जब ट्रंप ने अमेरिका की पुरानी नीति को बदलते हुए पुतिन के प्रति गर्माहट और यूक्रेन के प्रति ठंडा रवैया दिखाना शुरू किया था। हालांकि, फिर ट्रंप अपनी शैली के अनुरूप बदलते दिखे। ग्रीनलैंड के मुद्दे ने दोनों पक्षों के बीच विवादों को फिर हवा दी है, जहां ट्रंप की आक्रामकता पर प्रतिक्रिया देते हुए यूरोपीय संघ ने भी अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को स्थगित कर दिया है।


नाटो प्रमुख से बातचीत के बाद ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर भविष्य के एक समझौते तक पहुंचने की बात कही है, लेकिन विश्व आर्थिक फोरम के मंच से ट्रंप ने जिस तरह से यूरोपीय देशों को आड़े हाथों लिया, उससे अमेरिका व यूरोप के बीच गहराते मतभेद ही उजागर होते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की टिप्पणी इस संबंध में उल्लेखनीय है कि हम नियमविहीन दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जिसमें साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं फिर से उभर रही हैं। इस बीच, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की इस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ट्रंप जिस राह पर चल रहे हैं, उसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं।


भारत के लिए अच्छी बात यह है कि यूरोपीय संघ नई ऊर्जा के साथ उसकी तरफ देख रहा है। दोनों के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौते पर आगामी 27 जनवरी को दस्तखत होने हैं, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील’ कहा जा रहा है। इसके अतिरिक्त, यूरोपीय संघ ने भारत के साथ एक नए रक्षा समझौते को भी मंजूरी दी है। ये समझौते भारत के लिए भी अहम हैं, लेकिन चूंकि बहुध्रुवीय विश्व में कोई भी गठबंधन स्थायी नहीं हो सकता, भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए संभलकर ही आगे बढ़ना होगा। जहां तक बात यूरोप और अमेरिका के बीच संबंधों के भविष्य की है, तो वे टूटन की कगार पर भले न हों, लेकिन बदलते समय की कसौटी पर इनकी मजबूत परीक्षा जरूर हो रही है।
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