उत्तराखंड में भीषण तबाही मची, तब जाकर यह पता चला कि वहां तो तरह-तरह के पर्यटन चल रहे थे। एक पर्यटन तो पर्यटन जैसा होता है, वैसा ही था। सैलानी जाते थे। घूमते-फिरते थे। वहां के झरने, जंगल और बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियां देखते थे, पहाड़ की आबोहवा का आनंद लेते थे और वहां के सौंदर्य का लुत्फ उठाते थे।
पर्यटक और ज्यादा आकर्षित हों, इसलिए वहां अच्छी-अच्छी सड़कें बनाई गईं। पहाड़ काटे गए। जेसीबी मशीनें लगाई गईं। विस्फोटों से पहाड़ उड़ाए गए। शहर बसाए गए। बाजार खड़े किए गए। बड़े-बड़े होटल बनाए गए। अच्छे-अच्छे रिजॉर्ट्स बनाए गए। इसके लिए नदियों के किनारे काट दिए, उनके पत्थर उठा लिए गए। यहां तक कि उनकी बजरी भी चुरा ली गई। हिमालय की छाती पर लगातार हो रही यह उछल-कूद न कुदरत को पसंद आई, न खुद हिमालय को। इंसान के इस दंद-फंद को उन्होंने बहुत सहन किया। पर जब सहन नहीं हुआ, तब उसने तांडव दिखा दिया।
वहां एक पर्यटन है तीर्थाटन का। लोग चार धाम की यात्रा यह सोचकर करते थे कि एक पंथ दो काज हो जाएंगे। इसमें तीर्थ का पुण्य तो मिलेगा ही, सैर-सपाटा भी हो जाएगा। सो पूरे परिवार के साथ तीर्थाटन होने लगा। ऐसे पर्यटकों के लिए लॉज बनाए गए, धर्मशालाएं बनाई गईं। सबने पुण्य कमाया। पर देवभूमि की चिंता किसी ने नहीं की। सो देवभूमि ने अपनी चिंता की। उसने आंसूओं की ऐसी जलधार बहाई कि सैलाब आ गया।
ये दोनों तरह के पर्यटन वहां बादल फटने से, सैलाब आने से पहले होते थे। पर अब कांग्रेस वाले कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी जी ने वहां डिजास्टर टूरिज्म का आनंद उठाया। यह डिजास्टर टूरिज्म क्या है जी! डिजास्टर मैनेजमेंट तो अपने देश को छोड़कर सब जगह है। अपने यहां टूरिज्म है, धार्मिक टूरिज्म और मेडिकल टूरिज्म भी खूब फल-फूल रहा है। पर डिजास्टर टूरिज्म पहली बार सुनने में आया।
हालांकि जब कोई नेता बाढ़ की तबाही देखने के लिए हेलीकॉप्टर में उड़ान भरता है, तब वह डिजास्टर टूरिज्म ही होता है। पर इसे टूरिज्म का दर्जा पहली बार मिला है। और कांग्रेसियों की बात मानी जाए, तो मोदी जी अपनी तरह के अनोखे इस टूरिज्म के पहले टूरिस्ट बने। उन्होंने वीआईपियों की उड़ान रोकने के सरकार के निर्देश को नहीं माना और डिजास्टर टूरिज्म कर आए। इसे कहते हैं राजनीति। इसके बाद कौन मानेगा कि राजनेता सचमुच संवेदनशील होते हैं!