उल्लेखनीय है कि भारत ने लगातार यह बात उठाई है कि टीआरएफ व अन्य आतंकी संगठनों को पाकिस्तान से समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में, विदेश मंत्री जयशंकर ने उचित ही इस कदम की सराहना करते हुए इसे आतंकवाद के खिलाफ दोनों देशों के सहयोग का एक ठोस प्रमाण बताया है। अमेरिका द्वारा टीआरएफ को फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन (एफटीओ) और स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (एसडीजीटी) के रूप में नामित करने से इस संगठन की वित्तीय गतिविधियों पर अंकुश लगने के साथ ही इसके सदस्यों की संपत्ति की जब्ती, यात्रा प्रतिबंध व अन्य कानूनी कार्रवाइयों का रास्ता भी खुलेगा।
इसके अलावा, यह कदम भारत को एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) में पाकिस्तान को फिर से ग्रे सूची में शामिल कराने में मदद दे सकता है। एफएटीएफ, जो धन शोधन और आतंकवाद की फंडिंग को रोकने के लिए वैश्विक मानक स्थापित करता है, ने पहले भी 2008-09, 2012-15 और 2018-22 के दौरान पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखा था। दरअसल, भारत का तर्क है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने में विफलता दिखाई है, जिसकी पुष्टि पहलगाम जैसे आतंकी हमलों से होती है।
हालांकि, जिस तरह से चीन ने बार-बार संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों मसलन, जैश के सरगना मौलाना मसूद अजहर के भाई अब्दुल रऊफ असगर, जो 2001 में भारतीय संसद पर हमले का मास्टरमाइंड था और साजिद मीर को वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल होने का मार्ग अवरुद्ध किया, उससे पता चलता है कि आतंकवाद की चुनौती कितनी जटिल है। अब भारत को इसका उपयोग करते हुए एफएटीएफ में अपने तर्क को मजबूती से रखना होगा और इसके लिए मेक्सिको, अर्जेंटीना, कनाडा और डेनमार्क जैसे देशों का कूटनीतिक समर्थन जुटाना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जब तक आतंक के सरपरस्तों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुली छूट मिलती रहेगी, तब तक आतंकवाद के खिलाफ जंग अधूरी रहेगी।