भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर थिम्पू और ढाका होते हुए आखिर इस्लामाबाद पहुंच ही गए। मोदी सरकार के रणनीतिकारों को यह भरोसा है कि विदेश सचिव का इस्लामाबाद दौरा दोनों देशों के बीच रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने में सहायक होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली हो, यह तो अधिकांश लोग भी चाहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि सरकार के रणनीतिकार आखिर किस आधार पर पाकिस्तान के व्यवहार में बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं?
क्या ये वही रणनीतिकार नहीं हैं, जिन्होंने लगभग सात महीने पहले भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ सचिव स्तर की वार्ता समाप्त करने की सलाह दी थी? यदि ऐसा है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या पाकिस्तान ने अपना वह नजरिया बदल लिया है, जो सात महीने पहले था? अगर नहीं, तो भारत क्यों अपने कूटनीतिक निर्णयों पर अडिग नहीं रह पाता, क्योंकि इस अनिश्चितता से उसकी कूटनीतिक साख तो गिरती ही है, पाकिस्तान भी इसका प्रचार अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भरपूर तरीके से करता है।
खैर, विदेश सचिव की अपने समकक्ष एजाज चौधरी से अच्छी मुलाकात हुई है। पाकिस्तान के अखबारों के मुताबिक, विदेश सचिव खुश हैं और आशान्वित भी। ऐसा होना भी चाहिए, लेकिन यहां कुछ अहम पक्ष हैं। यदि प्रधानमंत्री मोदी को पाकिस्तान के साथ सचिव स्तरीय वार्ता रोकने के बाद यह एहसास हो गया था कि भारत का निर्णय गलत था, तो उन्हें काठमांडू सार्क शिखर सम्मेलन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से अलग से बात करनी चाहिए थी और पाकिस्तान पर अपना नजरिया स्पष्ट करने के लिए दबाव डालना चाहिए था।
मगर तब ऐसा नहीं हुआ। तब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया, जब तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत दौरे पर नहीं आए या उन्होंने कुछ ऐसी टिप्पणियां नहीं कीं, जो भारतीय नेतृत्व को संदेश देने वाली हों। इससे अब भारत की राजनयिक दृढ़ता पर प्रश्नचिह्न ही नहीं लग रहा, बल्कि यह भी संदेश जा रहा है कि पाकिस्तान के साथ भारत ने जो वार्ता न करने का निर्णय लिया था, वह गलत था। इसके बरक्स पाकिस्तान ने अब तक यह बताने की कोशिश की है कि उसे भारत की जरूरत नहीं है। यही नहीं, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने यह भी कहा था कि भारत की नीति में विरोधाभास ही दोनों देशों के बीच तनाव का कारण है। तो क्या संबंध सुधारने की नई कोशिश सरताज अजीज की उसी बात की पुष्टि नहीं है?
लिहाजा ऐसे कदम देश की कूटनीतिक साख के लिए ठीक नहीं। सात महीने पहले उठाए गए कदमों का एक गलत परिणाम यह आया कि पाकिस्तान की चीन से नजदीकी काफी बढ़ गई। वह उसकी सहायता से संभवतः परमाणु कार्यक्रम भी शुरू कर चुका है, जैसा इंस्टीट्यूट फॉर साइंस ऐंड इंटरनल सिक्यूरिटी की रिपोर्ट बताती है। बहरहाल, यह देखना होगा कि भारतीय विदेश सचिव पाकिस्तान की मनोदशा बदलने या फिर सार्क सद्भावना के जरिये उसे कितना सद्भावी बना पाते हैं, विशेषकर तब, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार यह कह चुके हों कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान अपना राजनीतिक, राजनयिक और नैतिक समर्थन देना किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा।