अगर हम यह कहते रहे हैं कि 19वीं शताब्दी का रूसी साहित्य गोगोल के ओवरकोट से बाहर आया तो किसी को भी यह कहते हुए संकोच नहीं करना चाहिए कि 20वीं शताब्दी की फिल्मों की दुनिया में स्पेशल इफेक्ट्स रे हैरीहॉजन की जेब से बाहर आए।
आज बहुतों के लिए यह विश्वास करना कठिन है कि बेजान पुतलों में, डरावने सांपों में, आग उगलते ड्रैगन में जान फूंकने वाले रे हमारे बीच अब नहीं हैं। फिल्मों में तकनीक की दुनिया की वह विचित्र, अनूठी और लगभग अकेली जगह थी, जहां बैठकर उन्होंने कई दशक तक दुनिया भर के फिल्मकारों को तकनीक के तिलिस्म के कई पाठ पढ़ाए थे।
‘लाइफ ऑफ पाई’ शुरू करने से पहले आंग ली भी रे के पास ही गए थे। ‘रा.वन’ से पहले शाहरुख, ‘रोबोट’ से पहले रजनीकांत और उससे बहुत पहले ‘कोई मिल गया’ में जादू करने वाले राकेश रोशन भी तो रे हैरीहॉजन के स्टूडियो में दस्तक दे आए थे।
ऐसा नहीं था कि बड़े शौक से देख रहा था जमाना और हैरीहॉजन जादू दिखा रहे थे। विगत कई सालों से वह अपना काम छोड़ चुके थे, लेकिन सालों पहले जो रास्ता उन्होंने बनाया था, उस पर फिल्मकारों की नई पौध को चलते, कुछ नया करते देख उन्हें सुकून मिलता था।
पुराने समय के डायनासोर, डूबता टाइटैनिक, उड़ते इन्सान, एलियन्स, लावा उगलता ज्वालामुखी, उड़ती परियां, आकाश में लड़ते देवता, अपनी कक्षा छोड़ चुके आवारा नक्षत्र...ये सब फिल्मों के लिए कभी महज कल्पनाएं थीं। लेकिन पहली बार इन कल्पनाओं को अपने तकनीकी कौशल से सच कर दिखाया था रे हैरीहॉजन ने।
तभी तो हाल के दिनों में भी उनकी एक सलाह हॉलीवुड की किसी फिल्म के लिए वरदान से कम नहीं होती थी। रे हैरीहॉजन 92 साल के थे। हैरीहॉजन का निधन लंदन के हैमरस्मिथ अस्पताल में हुआ, जहां पिछले एक हफ्ते से उनका इलाज चल रहा था।
रे अफ्रीका की खोज करने वाले डेविड लिविंगस्टोन के पर-पोते थे और लॉस एंजिल्स शहर में जन्मे थे। बचपन में उन्होंने मूक फिल्म द लॉस्ट वर्ल्ड (1925) और विलिस ओ ब्रायन की डायनासोर्स पर स्टॉप मोशन फिल्म देखी थी। इस फिल्म के डायनासोर्स को बहुत बाद तक भी अपनी कल्पना में वह देखते रहे थे। 1933 में हॉलीवुड में जब उन्होंने चीनी सिनेमा हॉल ग्रॉमैन में किंग कॉन्ग देखी तो उनके करियर की दिशा लगभग तय हो गई।
इस फिल्म को देखकर वह मिट्टी के पुतले बनाने लगे और उन्हें गति देने की जुगत में लग गए। उन्होंने 16 एमएम का कैमरा उधार लिया। भालू बनाने के लिए उन्होंने अपनी मां का पुराना फर का कोट काट डाला। तब उन्होंने एक ऐसी फिल्म बनाई, जिसमें वह और उनका कुत्ता एक भालू से आतंकित हो गए थे। इस अद्भुत फिल्म को देखकर मां-बाप इतने खुश हुए कि रे को कोट बर्बाद करने की सजा नहीं मिली।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रे ने फ्रेंक केप्रा की फिल्म यूनिट में काम किया। यह यूनिट फौज के प्रशिक्षण के लिए 'व्हाई वी फाइट' सीरीज बना रही थी। युद्ध के बाद उन्होंने परियों के स्टॉप मोशन संस्करण बनाए। उनके काम को देखकर उनके डायरेक्टर ओब्रायन इतने खुश हुए कि उन्हें माइटी जो यंग के लिए बंदर का किरदार गढ़ने का प्रोजेक्ट दे दिया। इस काम के लिए रे को एकेडमी अवॉर्ड भी मिला।
बाद में उन्होंने अलग होकर काम करना शुरू कर दिया। फिर तो दुनिया उनकी दीवानी हो गई। 'जेसन एंड द अर्गोनॉट्स' और 'क्लैश ऑफ द टाइटन्स', 'द बीस्ट फ्रॉम 20,000 फेथम्स', 'द वैली ऑफ ग्वांगी' और 'द सेवेन्थ व्यॉएज ऑफ सिंदबाद' जैसी उनकी फिल्में मील का पत्थर साबित हुईं। उन फिल्मों में तलवार से लड़ाई करते कंकालों, गोल्डन गेट ब्रिज तोड़ता बड़ा सा ऑक्टोपस, साइक्लोप्स और कई असाधारण जीवों को भला कौन भूल सकता है!
हैरीहॉजन की तकनीक उतनी ही पुरानी है, जितना मोशन पिक्चर। स्टार वार्स फिल्म बनाने वाले जॉर्ज लूकस ने एक बार फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, ''मैंने कई फंतासी फिल्में देखी हैं लेकिन दूसरी फिल्मों में वह बात नहीं थी, जो रे की फिल्मों में हुआ करती थी। रे ने 3 से 15 इंच तक के कई एलियन्स बनाए और अलग-अलग फ्रेम में उनके फोटो इस तरह लिए जैसे कि उनमें जान आ गई हो।''
अक्षय कुमार की नई फिल्म 'पिस्तौल' के एक्शन सीन्स को अव्वल दर्जे का बनाने के लिए हॉलीवुड से आए एक्शन डायरेक्टर ग्रेग पॉवेल , जिन्होंने 'स्काइफॉल' का एक्शन दिया है, कहते हैं, ''उनकी कल्पनाशीलता असीम थी और स्वभाव मजाकिया था। उन्होंने जिन प्राणियों की रचना की, वे असाधारण थे।''
रे ने जो काम किया, वह आजकल कंप्यूटर पर डिजिटल तरीके से किया जा सकता है। हालांकि रे नई डिजिटल तकनीकों के प्रशंसक थे, लेकिन फिर भी वे स्टॉप मोशन एनीमेशन को तरजीह देते थे। वह अपने प्राणियों को पूरी तरह असली बनाने के हिमायती नहीं थे।
सपनों की दुनिया का अहसास उन्हें अलग ही तरह का आनंद देता था। उनके दोस्त और साइंस-फिक्शन लेखक रे ब्रेडबरी मानते हैं कि 'एक तकनीशियन, कलाकार और अनंत कल्पनाशीलता वाले इन्सान के तौर पर वह अपने आप में अनूठे थे। पौराणिक कथाओं के किरदार वह खुद गढ़ते थे और उन्हें जीवंत भी कर देते थे।'
आने वाले वक्त में पता नहीं सिनेमा की दुनिया में तकनीक कहां से कहां पहुंच जाए, न जाने कितने प्रतिभावान लोग सामने आएं, लेकिन रे जैसे कुछ लोग भी होते हैं कि जो पुरानी लीक को तोड़कर नए जमाने में कुछ नया करने का जोखिम मोल लेते हैं। इसलिए फिल्मों में जब-जब तकनीक की बात उठेगी, रे हैरीहॉजन हमारे बीच होंगे।