उस बलात्कार की भर्त्सना करने के लिए कदाचित कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं होगा; लेकिन उतनी ही निंदनीय विगत पांच मार्च को प्रतिशोध लेने की वह घटना भी है-खासकर जिस तरह से 'हम ईसाई नगाओं' ने कथित बलात्कारी को रास्ते में घसीटा, फिर बेहद अकल्पनीय ढंग से प्रसिद्ध क्लॉक टावर के पास ले जाकर पीट-पीटकर उसे मार डाला। उस भीषण उत्पीड़न के बारे में बताते हुए, या फिर उसकी कल्पना करते हुए भी आज मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिसने अंततः उसकी जान ले ली।
यहां तक कि वधस्थल तक किसी जानवर को ले जाते हुए भी इससे अधिक करुणा दिखाई जाती है। इस करतूत के जरिये नगाओं ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि हम सच्चे 'ईसाई' नहीं हैं। जिस क्लॉक टावर से दीमापुर के निवासियों की अनेक गौरवशाली स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, वह अब शर्म, असहिष्णुता और अमानवीयता का प्रतीक बन गया है, और विडंबना देखिए कि इस बदनामी में उस टावर का कोई हाथ नहीं है।
इस चरम निंदनीय कृत्य के बाद भी क्या हम क्रिसमस के समय रोशनी, साज-सज्जा और क्रिसमस ट्री के जरिये इस टावर की शोभा बढ़ाएंगे? यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि यह काम करके हमने पूरी दुनिया में अपनी भद पिटवाई है। क्या हम इस शर्म से कभी उबर भी पाएंगे?
दीमापुर की इस बर्बरता ने स्थानीय पुलिस-प्रशासन के मोर्चे पर भी गंभीर खामी की ओर इशारा किया है। भीड़ एक व्यक्ति को जानवर की तरह घसीटकर ले जा रही थी, जबकि पुलिस-प्रशासन की भूमिका मूक दर्शक से अधिक की नहीं थी। बेशक भीड़ से आप विवेक की उम्मीद नहीं कर सकते। भीड़ का चरित्र पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है। इस मामले में विकसित विश्व की भीड़ विकासशील या कम विकसित इलाके की भीड़ से अलग कतई नहीं होती। अमेरिका में भी भीड़ इसी तरह का बर्ताव करती है, जैसा कि वह नगालैंड में या फिर भारत के किसी दूसरे इलाके में।
दीमापुर की सड़क पर विगत पांच मार्च को इकट्ठा हुई वह भीड़ भी अपने चरित्र में ऐसी ही थी। कुशल, प्रभावी और संगठित पुलिस-प्रशासन भीड़ को काबू करने में प्रायः सफल होते हैं। ऐसे कई मामले हैं, जिनमें समय पर कार्रवाई करते हुए पुलिस-प्रशासन ने कई बार अनहोनियों को रोका है। लेकिन दीमापुर के हमारे जिम्मेदार पुलिस प्रशासनिक अधिकारी और राजनेता जब तक पहल करते, तब तक स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी। मैं चकित हूं कि वे समय पर इस मामले की गंभीरता को भांप नहीं पाए। और जब तक वे सक्रिय होते, तब तक करने के लिए कुछ बचा नहीं था।
मैं दीमापुर की उस घटना की घोर निंदा करता हूं। साथ ही साथ, मैं मुख्य सचिव और सरकार से यह अपील भी करता हूं कि दीमापुर जैसी अशांत जगह में डीसी और एसपी की जिम्मेदारी योग्य लोगों को ही सौंपी जाए। मैं इस पर भी हैरान हूं कि न मुख्यमंत्री, और न ही गृह मंत्री ने इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी ली। क्या नगा राजनेता नैतिकता में यकीन नहीं करते? हम नगाओं को आत्ममंथन की जरूरत है।
इस्टर्न मिरर में उनके ब्लॉग से