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डिजिटल सबूत और मीडिया ट्रायल: अदालतों के सामने क्यों खड़ा हुआ बड़ा संवैधानिक सवाल? कैसे बनेगा संतुलन

विनय झैलावत, पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 30 Jul 2026 06:47 AM IST

सार

डिजिटल युग ने सबूत जुटाना आसान तो बनाया है, पर पूर्वाग्रह भी उतनी ही तेजी से बढ़ाए हैं। चैट, ई-मेल, स्क्रीनशॉट और सोशल मीडिया पोस्ट अक्सर अदालत के फैसले से पहले ही लोगों की राय बना देते हैं। ऐसे में, अदालतों के सामने चुनौती निजता, मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
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डिजिटल सबूत बढ़ा रहे हैं मीडिया ट्रायल - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी


जैसे-जैसे डिजिटल कम्युनिकेशन बढ़ रहा है, भारतीय अदालतों के सामने एक जटिल सांविधानिक मुद्दा खड़ा हो गया है। वे अब सिर्फ इस बात पर विचार नहीं कर रही हैं कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल सबूत के तौर पर किया जा सकता है या नहीं, बल्कि उन्हें डिजिटल कंटेंट के सार्वजनिक होने (लीक होने) के व्यापक असर पर भी ध्यान देना पड़ रहा है। उन्हें यह भी देखना पड़ रहा है कि ऐसे लीक किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, सम्मान और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को कैसे प्रभावित करते हैं।


तेजी से हो रहे डिजिटलाइजेशन ने दुनियाभर की आपराधिक न्याय प्रणालियों पर काफी असर डाला है। स्मार्टफोन व इंटरनेट जैसी तकनीक के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की वजह से आपराधिक मामलों की जांच और उनके फैसलों में इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल सबूतों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। ‘मीडिया ट्रायल’ का चलन भी शुरू हुआ है, जिसमें अदालतों द्वारा फैसला सुनाए जाने से पहले ही सार्वजनिक तौर पर आपराधिक मामलों पर बड़े पैमाने पर चर्चा और विश्लेषण किया जाता है।


न्यायमूर्ति केएस पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने निजता को अनुच्छेद 21 का एक जरूरी हिस्सा माना और सूचना से जुड़ी आजादी तथा व्यक्ति की गरिमा की सुरक्षा के लिए व्यापक सांविधानिक सुरक्षा तय की। फैसले में यह भी माना गया कि तकनीक ने निजता के उल्लंघन के तरीकों को बदल दिया है। आज की तकनीक से काफी मात्रा में जानकारी को इकट्ठा करना, स्टोर करना, दोबारा बनाना और फैलाना मुमकिन है। हालांकि, कोर्ट का मुख्य ध्यान निगरानी और डाटा इकट्ठा करने पर था, पर उस मामले के सिद्धांत लीक हुई चैट और डिजिटल बातचीत के दूसरे रूपों पर भी लागू होते हैं। लेकिन, समस्या तब और बढ़ जाती है, जब डिजिटल बातचीत सिर्फ अदालत या जांच एजेंसियों की फाइलों तक सीमित नहीं रहती। आजकल ऐसी बातचीत अक्सर सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर तेजी से वायरल हो जाती है। नतीजतन, अदालत के यह तय करने से पहले ही कि यह बातचीत सबूत के तौर पर कितनी महत्वपूर्ण है, लोग लीक हुई चैट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी, अनैतिक या अविश्वसनीय मानने लगते हैं।


आज की कानूनी व्यवस्थाओं में डिजिटल सबूत बेहद जरूरी साधन हैं। इनकी मदद से जांच एजेंसियां और अदालतें इलेक्ट्रॉनिक डाटा के आधार पर सच का पता लगा सकती हैं और तय कर सकती हैं कि जिम्मेदार कौन है। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, डिजिटल सबूतों का दायरा और उनकी जटिलता भी बढ़ेगी। इसलिए, कानूनी पेशेवरों, जांचकर्ताओं और अदालतों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे कानूनी मानकों का पालन करते हुए इलेक्ट्रॉनिक जानकारी को संभालने, उसकी प्रामाणिकता की जांच व व्याख्या करने में महारत हासिल करें।


 भारतीय साक्ष्य अधिनियम इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को मान्य सबूत मानता है, बशर्ते उनकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए सर्टिफिकेशन से जुड़ी कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा व्यवस्थाएं मौजूद हों। हालांकि, भारत की अदालतों के फैसलों ने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों से जुड़े भारतीय कानून को काफी बेहतर बनाया है, पर न्यायिक विश्लेषण मुख्य रूप से स्वीकार्यता, प्रक्रियात्मक अनुपालन और प्रामाणिकता के सवालों पर केंद्रित रहा है। इसके विपरीत, अदालतों ने निजी बातचीत के बिना नियमन वाले सार्वजनिक दायरे में आने से उत्पन्न होने वाले सांविधानिक परिणामों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया है। इस मुद्दे से निपटने में कठिनाई तब और बढ़ जाती है, जब निजी बातचीत लीक होने के मामलों में कई कानूनी हित शामिल होते हैं। उदाहरण के लिए, जांच एजेंसियां सबूत के तौर पर ऐसी बातचीत पर निर्भर हो सकती हैं। इसी तरह, मीडिया संगठन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित के आधार पर इसे प्रकाशित करने को सही ठहरा सकते हैं। साथ ही, जिन लोगों की निजी बातचीत लीक होती है, अनुच्छेद 21 के तहत उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान और अन्य तरह की क्षति पहुंचती है। नतीजतन, भारतीय अदालतों को यह तय करना होगा कि जब किसी व्यक्ति की निजी बातचीत सार्वजनिक हो जाए और उसे वापस हटाया न जा सके, तब निजता के अधिकार, मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


 भारत में डिजिटल सबूतों और मीडिया ट्रायल के बीच बढ़ते मेल-जोल ने आपराधिक न्याय प्रणाली के स्वरूप को काफी बदल दिया है। डिजिटल सबूत आधुनिक जांच और अदालती कार्यवाही का एक जरूरी हिस्सा बन गए हैं। न्यूज चैनलों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म के बढ़ने से आपराधिक मामलों पर जनता की नजर और बढ़ गई है, जिससे अक्सर समानांतर मीडिया ट्रायल होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का समय से पहले खुलासा जनता की राय में पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है और संभावित रूप से ट्रायल की निष्पक्षता में बाधा डाल सकता है।
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कई बार मीडिया डिजिटल सबूतों को अधूरी जानकारी या अनुमान के आधार पर पेश करता है। इससे उस कानूनी सिद्धांत को नुकसान पहुंच सकता है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे। इसके अलावा, टेलीविजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये ऐसे सबूतों के व्यापक प्रसार से निजता का उल्लंघन, प्रतिष्ठा को नुकसान और जांचकर्ताओं व न्यायिक अधिकारियों पर दबाव जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

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