लगभग एक साल पहले पाकिस्तानी सैनिक नियंत्रण रेखा के इस तरफ आकर हमारे सैनिकों के सिर काट ले गए थे। हमारी सरकार ने पहले इस पर विरोध जताया, फिर चुप्पी साध ली। चीनी सैनिकों ने दौलत बेग ओल्डी में आकर अपना शिविर लगा दिया, लेकिन तब हमारे विदेश मंत्री ने यह कहकर बात टाल दी थी कि इसे एक खूबसूरत चेहरे पर छोटी-सी फुंसी के रूप में देखा जाना चाहिए। यानी चीन के साथ हमारे खूबसूरत रिश्ते में कड़वाहट नहीं आनी चाहिए। लेकिन न्यूयॉर्क में हमारी एक राजनयिक गिरफ्तार क्या हुई, उस पर ऐसा हंगामा खड़ा हुआ पिछले दिनों, जैसे अमेरिका के साथ हमारे सारे संबंध तोड़ने की नौबत आ गई है। संसद में अलग-अलग राजनीतिक दलों के वरिष्ठ सदस्यों ने अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए खूब कोसा अमेरिका को।
क्या इतनी बड़ी ज्यादती हुई थी देवयानी खोबरागड़े के साथ कि यह इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटना बन जाए? विनम्रता से अर्ज करती हूं कि मेरी नजर में तो इतनी बड़ी घटना बिल्कुल नहीं थी। देवयानी के खिलाफ शिकायत दर्ज हुई कि उन्होंने अपने एक मुलाजिम के लिए जो वीजा लिया, उसमें कुछ गड़बड़ियां थीं। शिकायत यह भी थी कि अमेरिकी कानून के तहत वह जो वेतन दे रही थी अपनी इस आया को, वह काफी नहीं था। उन्होंने कानून तोड़ा, गिरफ्तार हुईं और फिर छोड़ दी गईं जमानत के तहत।
लेकिन अपने राजनेताओं ने इस पर हंगामा यों मचाया, जैसे सीधा दोष लगना चाहिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सिर पर। इतने तूफानी भाषण दिए गए देश में कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने निजी तौर पर खेद जताया, लेकिन यह भी हमने काफी नहीं समझा और अमेरिका से माफी मांगने की जिद की। ऐसा क्यों? इतना गुस्सा हमको कभी क्यों नहीं आता पाकिस्तान और चीन की हरकतों पर?
अमेरिका के साथ हमारा रिश्ता शुरू से पेचीदा रहा है इतना कि अक्सर छोटी बात बहुत बड़ी बन जाती है। साथ-साथ, हमारे देशवासी अमेरिका से जितना प्यार करते हैं, शायद ही किसी दूसरे देश से करते होंगे। अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, आज भारतीय विद्यार्थी चीन के बाद उसी के विश्वविद्यालयों में सबसे ज्यादा हैं। शिक्षित मध्यवर्गीय भारतीय मौका मिलते ही भाग जाते हैं अमेरिका।
और अगर आप अमेरिका के छोटे शहरों में घूमने निकलते हैं कभी, तो हैरान होंगे यह देखकर कि तकरीबन जितने भी मोटल हैं, उनके मालिक आजकल गुजराती हैं। विगत सितंबर में मैं न्यूयॉर्क गई थी काफी अर्से के बाद और यकीन कीजिए कि कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा कि इस शहर में भारतीयों की संख्या दोगुनी हो गई है। टैक्सी में बैठी, तो चालक पंजाबी निकला, दुकानों में खरीदारी करने गई, तो वहां भी तकरीबन हर दुकान में मिला कोई देशवासी और किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने बैठी, तो वहां भी वेटर भारतीय निकले। इस शहर में दोस्त भी हैं मेरे कई सारे और सब कहते हैं कि जितनी खुशी और संपन्नता उनको अमेरिकी ने दी है, उनको शायद ही कभी भारत में मिल पाती।
आगे सुनिए। जो अपने वरिष्ठ मंत्री रोज तूफानी भाषण दे रहे हैं अमेरिका के खिलाफ, उनमें से आधे ऐसे हैं, जो हर साल अमेरिका जाते हैं किसी न किसी बहाने। यह न भूलिए कि इस देश की सबसे बड़ी राजनेता, सोनिया गांधी, भी हर दूसरे-तीसरे महीने जाती हैं न्यूयॉर्क अपना इलाज करवाने। जब वह बीमार पड़ी थीं दो वर्ष पहले, तो अफवाह थी कि बीमारी इतनी गंभीर है कि उसका इलाज सिर्फ अमेरिकी डॉक्टर ही कर सकते हैं।
तो क्या हम ज्यादती नहीं कर रहे हैं देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी पर इतना हंगामा खड़ा करके? क्या बेहतर नहीं होगा कि हम अपना गुस्सा पाकिस्तान और चीन के लिए बचाकर रखें, जो भारत के जानी दुश्मन हैं? क्या बेहतर नहीं होगा कि हमारे राजनेता एक ठंडी सांस लेकर याद करें कि अगर इन देशों के साथ हमारी दुश्मनी भविष्य में युद्ध का रूप धारण कर लेती है, तो हमारा सबसे महत्वपूर्ण दोस्त अमेरिका ही होगा? यह भी याद करना जरूरी है कि 26/11 के आतंकवादी हमले के बाद अगर किसी देश ने हमारी मदद की सुराग ढूंढने में, तो वह देश अमेरिका था।