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सिर्फ पूंजी से विकास नहीं होगा

Sat, 06 Apr 2013 12:00 AM IST
नई दिल्ली
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लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही विभिन्न दलों के नेता विकास का अलग-अलग मॉडल पेश कर रहे हैं। विकास के इन मॉडलों और राजनीतिक हकीकत पर संघ के राजनीतिक चिंतक गोविंदाचार्य से हिमांशु मिश्र ने बातचीत की:-
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:- चुनाव के पहले विकास के अलग-अलग मॉडल पेश किए जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बाद अब राहुल गांधी ने एक नया मॉडल दिया है। किस मॉडल को श्रेष्ठ मानते हैं आप?

:- मेरी राय में ये अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही मॉडल है। चाहे मोदी हों या नीतीश या फिर राहुल गांधी, इन सभी के मॉडल का आधार जन आधारित विकास न होकर केवल पूंजी है। वह पूंजी, जो इन्हें औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मिलती है, और जिससे सत्ता में राजनीतिक दलों और देशी-विदेशी पूंजीपतियों का आम आदमी को हाशिये पर डालने के लिए खतरनाक, लेकिन बेहद मजबूत गठजोड़ तैयार हुआ है। सीधे शब्दों में कहें, तो इसे 'घरफूंक तमाशा देख' मॉडल कहना ही ज्यादा उचित होगा।
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:- किस आधार पर आप ऐसा कह रहे हैं?

:- दरअसल वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से आम आदमी और इनके नेतृत्व को सिरे से गायब कर दिया गया है। यह वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से तीसरे-चौथे विकल्प को दूर रखने की मिली-जुली कुश्ती है। यह विकास की ऐसी अवधारणा है, जिसमें रोजगार पैदा होने और आम लोगों का जीवन स्तर सुधरने के बदले अमीरों को और अमीर बनाने का भरपूर इंतजाम हैं। बीते दो दशकों को ही देखिए, अपने देश में एक ओर अरबपतियों की भरमार हुई है, तो दूसरी तरफ कर्ज में डूबे लाखों किसानों ने आत्महत्या भी की है। ऐसे मॉडल को क्या घरफूंक तमाशा देख मॉडल नहीं कहेंगे?

:- क्या आपका यह कहना है कि सत्ता चाहे जिस भी हाथ में जाए, परिस्थितियां नहीं बदलेंगी?

:- मैं नाउम्मीद नहीं हूं। वह इसलिए कि देश के लोगों की समझ बेहद गहरी है। इसलिए मुझे लगता है कि राजनीतिक स्थिति जल्दी ही बदलेगी। वैसे भी प्रकृति में ही बदलाव के गुण छिपे होते हैं। निश्चित समय के बाद यह बदलाव हमेशा से आकार लेता आया है। हालांकि मेरे लिए एक दूसरी भी चिंता है। अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं और वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इसी तरह बनी रही, तो देश में भीषण अराजकता फैलेगी। ऐसे में गरीब तो मर जाएंगे, मगर अमीर मार दिए जाएंगे।

:- आपने बदलाव की बात की। कहां से और कब आएगा यह बदलाव, जब आपके हिसाब से देश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था ही एक जैसी गई है?

:- यह सही है कि वर्तमान राजनीतिक तंत्र पर बाहुबल, सत्ता बल और धन बल बुरी तरह हावी हो चुका है। हालांकि कई ऐसे समूह और व्यक्ति हैं, जो आत्मबल और जनबल से बदलाव की उम्मीद जगा रहे हैं। देश भर में ऐसे लगभग तीन सौ समूह और व्यक्ति हैं, जिन्हें व्यापक जनसमर्थन भी मिल रहा है। इस कड़ी में अन्ना हजारे, पीजी राजगोपाल, अरविंद केजरीवाल, बाबा रामदेव, जनरल वीके सिंह, श्रीश्री रविशंकर आदि का नाम लिया जा सकता है।

:- मगर आपने जिन लोगों का नाम लिया, उनमें आपसी प्रतिद्वंद्विता और मतभेद भी चरम पर हैं। ऐसे में वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प खड़ा करना क्या कुछ ज्यादा ही बड़ी बात नहीं हो जाएगी?

:- बेशक यह सही है कि इन लोगों के बीच गहरे मतभेद हैं। मगर आपने देखा होगा कि मतभेदों और अलग-अलग अभियानों के बावजूद इनमें वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की वैचारिक एकता भी साफ दिखाई देती है। मैं एक गोलमेज सम्मेलन बुलाकर इन समूहों और व्यक्तियों को एक मंच पर खड़ा करने का प्रयास कर रहा हूं। सफलता की उम्मीद ही नहीं, मुझे पूरा विश्वास भी है।
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