अगर अपने पाप कर्म का बोध हो जाए, तो वही वास्तव में उस पाप का प्रायश्चित है। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसे कई प्रसंग हैं, जिनमें सीख दी गई है कि भले ही मानव के चरित्र में पाप-कर्म शामिल हो, लेकिन उसका प्रायश्चित भी जरूर करना चाहिए।
एक राजा के अत्याचारों से प्रजा कराह उठी। राजा को कुछ दिन बाद आत्मग्लानि हुई। वह एक महात्मा के पास गया और बोला, महाराज, मैंने बहुत पाप किए हैं। मेरे कल्याण के लिए कोई रास्ता सुझाएं। महात्मा ने कहा, आप दोपहर तक निद्रादेवी की उपासना किया करें। इससे जहां आपके पापों में कमी आएगी, वहीं प्रजा का भी भला होगा। राजा को यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि महात्मा जागने की जगह देर तक सोने को कह रहे हैं।
उसने पूछा, महात्मन, इतनी देर तक सोने से मेरा तथा प्रजा का कल्याण कैसे होगा? संत बोले, तुम जागते हुए प्रजा पर अत्याचार करते हो। जितना समय सोकर गुजारोगे, कम से कम उतने समय तक तो अत्याचारों के पाप से बचोगे।
संत के वचन ने राजा की आत्मा को कचोट डाला। उसने संकल्प लिया कि वह भविष्य में किसी के साथ अन्याय नहीं करेगा। कुछ दिन प्रजा से अच्छा बर्ताव करने के बाद राजा अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए राजपाट त्यागकर वन को प्रस्थान कर गया।