‘ग्लोबल साउथ के लिए प्रतिस्पर्धा: एशिया और एक बहुध्रुवीय दुनिया में नेतृत्व की खोज’ शीर्षक से एक नई रिपोर्ट, जिसे प्रसिद्ध थिंक टैंक द इटैलियन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज (आईएसपीआई) के लिए काम करने वाले विद्वानों फिलिपो फासुलो और निकोला मिसाग्लिया द्वारा संपादित किया गया है, में कहा गया है, ‘फिर भी, न तो ग्लोबल नॉर्थ और न ही ग्लोबल साउथ को एकीकृत ब्लॉक के रूप में देखा जा सकता है। सुधार का आह्वान अक्सर विभिन्न दिशाओं की तरफ खींचता है। इस विकसित होते परिदृश्य में भारत और चीन अग्रणी दावेदार के रूप में उभरे हैं, जिनमें से प्रत्येक एक अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था को आकार देने की होड़ में लगा है।’
बेशक चीन और भारत, दोनों एक बेहद संतुलित विश्व व्यवस्था को आकार देने की होड़ में शामिल हैं, लेकिन यह चीन के लिए आसान नहीं होने वाला है, जो खुद को उदार लोकतंत्र के पारंपरिक पाश्चात्य मॉडल के विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। यह भारत के लिए भी आसान नहीं है, जिसका भू-राजनीतिक प्रभाव वैश्विक मंचों पर बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने की भारत की कोशिश, उसकी विदेश नीति में नई दृढ़ता से उपजी है-यह आत्मविश्वास आर्थिक विकास और चीन के भू-राजनीतिक प्रतिबल तथा पश्चिम के लिए सेतु के रूप में उसकी बढ़ती हुई स्थिति से उत्पन्न हुआ है। फासुलो और मिसाग्लिया ने कहा, ‘वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता केवल चीन के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता पर निर्भर नहीं है। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भारत अपनी महत्वपूर्ण आंतरिक चुनौतियों का समाधान किस प्रकार करता है।’
वे बताते हैं कि ‘नरेंद्र मोदी–जो 2024 में तीसरे कार्यकाल के लिए कम बहुमत के साथ पुनः निर्वाचित हुए हैं-ने भारत की नौकरशाही को आधुनिक बनाने और अक्षमताओं को सुव्यवस्थित करने के लिए डिजिटल उपकरणों के प्रसार को बढ़ावा दिया है और यह कि भारत सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के जरिये बुनियादी ढांचे, नियामक सुधार और घरेलू उत्पादन में महत्वपूर्ण निवेश भी किया है।’ हालांकि भारत को वास्तव में नया चीन बनने (अगले वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने) के लिए अपनी मानव पूंजी में निर्णायक रूप से अधिक निवेश करना होगा।’
एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में कुछ भारतीय हमेशा बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे। कुछ लोगों ने हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया भी है। लेकिन किसी भी देश का भविष्य बहुसंख्यक लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, केवल कुछ लोगों पर नहीं। इसलिए स्वास्थ्य, शिक्षा, उन्नत प्रशिक्षण, भारत के कार्यबल में महिलाओं का समावेशन ज्यादा महत्वपूर्ण है। खासकर इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा और अनिश्चित दौर में। फासुलो और मिसाग्लिया कहते हैं, ‘भारत में स्कूली शिक्षा का औसत स्तर सिर्फ 6.5 साल है (इसकी तुलना में वियतनाम में 8.3 और थाईलैंड में 8.9 वर्ष है), तीन में से एक महिला श्रम बाजार से बाहर रहती है, और भारत का मध्यम वर्ग का उपभोक्ता आधार आश्चर्यजनक रूप से 500 अरब डॉलर है, जबकि वैश्विक बाजार 300 खरब डॉलर से ज्यादा का है। अगर भारत के उदय को ठोस, टिकाऊ और स्थायी बनाना है, तो इन चुनौतियों का समाधान किया जाना चाहिए।’
उनका तर्क है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत ने लोकतांत्रिक प्रणाली के माध्यम से आधुनिकीकरण को आगे बढ़ाया है, जो अपूर्ण होने के बावजूद मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा कि देश का लोकतंत्र ‘सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषायी रूप से बहुल समाज में राजनीतिक विभाजन, अपकेंद्रित ताकतों और कभी-कभार होने वाली हिंसक घटनाओं को नियंत्रित करने में कामयाब रहा है।’ स्पष्ट रूप से, भारत की कहानी इस बात पर निर्भर करती है कि देश अपनी बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ आंतरिक चुनौतियों का भी कुशलतापूर्वक प्रबंधन करता है। आंतरिक संतुलन काफी हद तक सामाजिक सद्भाव पर निर्भर करेगा। भारत अपनी मौजूदा दरारों को और गहरा करने का जोखिम नहीं उठा सकता। 1947 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से आजाद होने के बाद से भारत ने बहुत कुछ हासिल किया है। लेकिन चैन से सोने से पहले हमें अभी बहुत कुछ करना है।