तो जनाब, बिगुल बज चुका है! 2014 या मुलायम सिंह की मानें, तो इसी साल कभी भी लोकसभा के लिए होनेवाले 'वोटरलू' के लिए सेना तैयार होने लगी हैं, हथियार निकलने लगे हैं, युद्ध-समीक्षकों का दम फूलने लगा है। वैसे तो लोग हर चुनाव को महासंग्राम या महाभारत की संज्ञा देते हैं, लेकिन इस बार यह वाकई आधुनिक भारत के इतिहास का पहला राजनीतिक महाभारत होगा, शायद बहुत कठिन, बहुत भीषण, बहुत घमासान और बहुत अकल्पनीय स्थितियों का जनक भी!
दृश्य एक : गर्म हवा बहने लगी है। तीर्थराज प्रयाग से 'धर्मयुद्ध' का शंखनाद हो चुका है। संघ, विहिप, देश भर से आए साधु-संत और भाजपा की तरफ से ऐलान हो चुका है नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री और अयोध्या में राम मंदिर बनाने का। ये दोनों संकल्प एक मंच से एक साथ उठते हैं। इसका गहरा अर्थ है।
दृश्य दो : उधर दिल्ली में कॉलेज के छात्रों के सामने नरेंद्र मोदी बहुत आकर्षक पैकेजिंग में गुजरात के कॉस्मेटिक विकास की ऐसी 'आइटम गर्ल' नुमा सुपर हिट ब्रांडिंग पेश करते हैं कि लोग सब कुछ भूलकर मदहोश हो जाते हैं। मीडिया भी मदमस्त हो जाता है।
दृश्य तीन : एक अलसाए शनिवार को अचानक सुबह-सुबह खबर आती है कि अफजल गुरु को फांसी दे दी गई! कांग्रेस के तरकश से भी जवाबी तीर निकला!
यह इस युद्ध का पहला नमूना है! दरअसल, संघ ने इस महाभारत के लिए एक दोधारी तलवार चुनी है। एक धार विकास की, दूसरी धार हिंदू राष्ट्र की। संघ को लगता है कि इस बार जीत का जादुई चिराग वाकई उसके हाथ लग गया है। और यह चिराग है 'मोहिंदुत्व' का, जो मोदीत्व और हिंदुत्व को मिलाकर बना है। पिछले कई वर्षों से यह कहा जाता रहा है कि भाजपा गुजरात में चुनाव हिंदुत्व की बदौलत नहीं, मोदीत्व के चलते जीतती रही है।
इस मोदीत्व में कई चीजें शामिल हैं। 'विकास' और 'सुशासन' का एक मोदी फॉर्मूला तो है ही, लेकिन फिल्म में और भी बहुत कुछ है। मसलन, धुन का पक्का एक कद्दावर नेता, जो किसी को कुछ नहीं समझता, चाहे वह राजधर्म की दुहाई देनेवाले अटल बिहारी वाजपेयी हों या बात-बात पर देश की अदालतों की फटकार हो, जो चुटकियों में दो-टूक फैसले लेता है और आनन-फानन में उन्हें लागू भी कर देता है, जो मुंहफट है, जिसने 'गुजरात गौरव' को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, जो हमेशा हिंदुत्व की रक्षा करेगा, जो पाकिस्तान को धूल चटा देगा। इन सारे तत्वों से मिलकर बनता है मोदीत्व, जिसमें इन तमाम चटनियों के साथ सतह के नीचे 'मुसलमानों को मजा चखा देने' का घी भी शामिल है, जिसके बिना यह अवलेह तैयार ही नहीं हो सकता था!
इस बार गुजरात में भारी मतदान की आंधी के साथ मोदी ने जब तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीत लिया, तो किसी को संदेह नहीं रह गया कि भाजपा के तुरुप के इक्के मोदी ही होंगे। सब जानते हैं कि भाजपा में बहुत-से लोगों को मोदी रास नहीं आते और यह भी सही है कि मोदी के अचानक उभार से भाजपा के कई दिग्गजों के करियर को शायद कभी न खत्म होनेवाला ग्रहण लग जाए, फिर भी मोदीत्व की सुनामी के सामने समर्पण कर देने से बेहतर कोई विकल्प किसी के पास नहीं था। लेकिन संघ और भाजपा, दोनों यह समझते थे कि मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की तरह पेश करने के जितने फायदे हैं, उतने ही नुकसान भी!
मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से नीतीश कुमार जैसे साथी का राजग से हटना जहां लगभग तय माना जा रहा है, वहीं सरकार बनाने के लिए ममता बनर्जी समेत कुछ और पुराने सहयोगियों को भी भविष्य में ला पाना शायद संभव न होगा। इसलिए जरूरी है कि भाजपा अकेले इतनी सीटें जीत ले कि उसे सरकार बनाने के लिए या तो किसी की जरूरत न पड़े या फिर कम से कम साथियों से काम चलाया जा सके।
मौजूदा लोकसभा में भाजपा कुल 116 सीटें जीत पाई थी, जो बहुमत के 272 के आंकड़े से 156 कम है। 44 सीटें भाजपा के सहयोगियों ने जीती थीं। इसमें से अगर नीतीश कुमार के जेडी (यू) की 20 सीटें निकाल दें, तो राजग की कुल सीटें 140 पर सिमट जाती हैं। सवाल यह है कि बाकी 132 सीटों की कमी भाजपा कहां से पूरा करेगी? जयललिता के अलावा कोई नया बड़ा साथी फिलहाल मिलता नहीं दिखता। नवीन पटनायक एक समय भाजपा के साथ थे, फिर अलग हो गए, अब आएंगे या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी को भाजपा को पटाना होगा। कर्नाटक में येदियुरप्पा अगर रूठे रहे, तो भाजपा की सीटें वहां घटेंगी ही। इसलिए जरूरी है कि भाजपा पूरे देश में अपना जनाधार बड़े पैमाने पर बढ़ाए।
तो क्या ऐसा सिर्फ मोदीत्व से हो सकता है? जाहिर है कि नहीं। इसलिए संघ ने नई जुगत भिड़ाई। मोदीत्व की चटनी में हिंदुत्व की मिर्च इसीलिए झोंकी जा रही है। ध्यान दें कि पिछले डेढ़ दशक से भाजपा ने हिंदुत्व के एजेंडे को ठंडे बस्ते में रखा था। क्योंकि एक तो वह सत्ता की राजनीति को ततैया की तरह काट रहा था, फिर भाजपा के पास ऐसा कोई नेता बचा भी नहीं था कि वह 'हिंदुत्व की धर्मध्वजा' को अपने कंधों पर लेकर चल सके। लेकिन अब जब उसके पास मोदी के अलावा कोई विकल्प नहीं है और गुजरात दंगों का जिन्न फिर बोतल से बाहर आएगा ही, ऐसे में मोदीत्व के साथ हिंदुत्व को जोड़कर 'मोहिंदुत्व' की दोधारी तलवार से बेहतर जुआ संघ खेल भी नहीं सकता था।
रणनीति साफ है। मोदीत्व की बांसुरी से युवाओं और विकास के परवानों को मोहा जाए और हिंदुत्व की हुंकार से राम मंदिर और हिंदू राष्ट्र की बुझ चुकी बाती को दहकाया जाए। मोदी सिर्फ विकास-विकास खेलेंगे, विहिप ऐंड कंपनी हिंदुत्व का मसाला बेचेगी, बस हो गया काम! उधर, कांग्रेस ने अफजल गुरु का दांव चल दिया। क्या जबर्दस्त टाइमिंग है! आगे-आगे देखिए होता है क्या।