बरसों से शोधकर्ताओं को साइबर हमले को लेकर यही आशंका थी कि कृत्रिम खुफिया तंत्र (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी एआई) के जरिये किया जाने वाला सॉफ्टवेयर हमला डिजिटल हथियारों की एक नई होड़ शुरू कर सकता है। यह होड़ ऐसी जंग छेड़ सकती है, जिसमें हमलावर और पीड़ित, दोनों ही कृत्रिम खुफिया तंत्र से लैस होंगे और मनुष्य मात्र दर्शक बनकर रह जाएगा। मगर किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि इस तरह के शुरुआती मालवेयर ब्रिटिश बैंकिंग प्रणाली या फिर अमेरिका के सरकारी तंत्र के बजाय भारत जैसे विकासशील देश में हमला करेंगे।
साइबर सुरक्षा से संबंधित शोधकर्ता तेजी से पश्चिम से बाहर के उन देशों पर नजर रखे हुए हैं, जहां नए तरह के और कहीं अधिक खतरनाक साइबर हमले हो सकते हैं। दरअसल विकासशील अर्थव्यवस्थाएं तेजी से ऑनलाइन हो रही हैं, और हैकरों के लिए अपने कौशल को अजमाने की सबसे उर्वर जगहें बनती जा रही हैं, जहां उन्हें परीक्षण के लिए अनुकूल माहौल मिलता है। इनका इस्तेमाल वे कहीं अधिक उन्नत बचाव तंत्र से लैस किसी कंपनी और राष्ट्र-राज्य को निशाना बनाने के लिए कर सकते हैं।
भारत में ऐसे मालयेवर से हमला किया गया, जो प्रणाली के भीतर अधिक लंबे समय तक रह सकता है। साइबर सुरक्षा कंपनी डार्कट्रेस के मुताबिक यह कृत्रिम खुफिया तंत्र के शुरुआती संकेत हैं। डार्कट्रेस की मुख्य कार्यकारी निकोल एगन कहती हैं, भारत में संभवतः पहली बार नए तरह का एआई हमला देखा गया, क्योंकि ऐसे हमलों के लिए यह आदर्श जगह है। अमेरिकी कंपनियां जहां बचाव के लिए सुरक्षा के कई चरणों वाले पुख्ता इंतजाम करती हैं, वहीं दूसरी जगहों पर वैसी ही कंपनियों में सुरक्षा का सिर्फ एक चरण होता है।
अमेरिकी कंपनियां किसी देश की ओर से किए जाने वाले ऐसे हमलों को लेकर यह अपेक्षा कर सकती हैं कि उन्हें संघीय सरकार की ओर से आगाह किया जाएगा या फिर हमले की स्थिति में उन्हें मदद मिलेगी। मगर किसी और जगह पर कंपनियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अब अनुमान लगा रहे हैं कि फरवरी, 2016 में बांग्लादेश के सेंट्रल बैंक पर हमले को अंजाम देने वाले हैकरों का संबंध उत्तर कोरिया से हो सकता है। बाद में वियतनाम और इक्वाडोर में भी ऐसे ही हमले किए गए थे। हैकरों ने बांग्लादेश बैंक से 8.1 करोड़ डॉलर चुरा लिए थे। यह घटना दुनियाभर में सुर्खियां बनी थी। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने बाद में पाया कि हमलावरों ने बैंक के कंप्यूटरों में सेंध लगाई और बैंक की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा स्थानांतरित करने वाली प्रणाली तक पहुंच गए, जिसके जरिये अरबों डॉलर का लेन-देन होता है। यह एकदम अप्रत्याशित किस्म का साइबर हमला था। साइबर सुरक्षा कंपनी साइमैंटेक ने पाया कि इसके बाद से अब तक 31 देशों के बैंकों में इसी तरीके से सेंध लगाई गई। डार्कट्रेक के शोधकर्ताओं ने जिस मालवेयर की खोज की वह पूर्ण एआई की तरह काम नहीं कर रहा था, मगर जब तक वह प्रणाली के भीतर था, उसने नेटवर्क की गतिविधियों को कॉपी करने की कोशिश की।
एगन कहती हैं कि ऐसे हमले में चिंता की बात यह है कि एक बार भीतर चले जाने के बाद यह कृत्रिम खुफिया तंत्र (एआई) की तरह काम करने लगता है, मानो यह नेटवर्क में मौजूद कर्मचारियों के व्यवहारों को सीखने की कोशिश कर रहा हो। लंबे समय तक इसे पकड़ना भी मुश्किल होता है। वह आशंका जताती हैं कि आने वाले समय में विभिन्न देशों में ऐसे लोगों को रखने की होड़ मच सकती है, जो मालवेयर का इस्तेमाल करने में सक्षम हों। एगन की कंपनी के कैंब्रिज, इंग्लैंड और सैनफ्रैंसिस्को में मुख्यालय हैं। उनका कहना है कि भारत में अपनी कंपनी विस्तार करने के साथ ही उन्होंने पाया है कि वहां हैकिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
समरविला, मैसाच्युसेट्स स्थित साइबर सुरक्षा कंपनी रिकॉर्डेड फ्यूचर में खुफियागिरी के बढ़ते खतरों के विश्लेषण से जुड़े वरिष्ठ विश्लेषक एलन लिस्का के मुताबिक, दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका तथा दुनिया के अन्य हिस्सों में सक्रिय साइबर सुरक्षा कंपनियों ने नए तरह के मालवेयरों का पता लगाया है। उनके मुताबिक, पिछले कई वर्षों से ताइवान और दक्षिण कोरिया चीनी हैकरों के लिए परीक्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन देशों में उच्च गति वाले इंटरनेट हैं, इंटरनेट का काफी विस्तार भी है, मगर साइबर सुरक्षा व्यवस्था बेहद लचर है। हमने हमलावरों में एक खास तरह की समानता देखी है। वे किसी चीज का परीक्षण करते हैं, फिर कुछ सुधार करते हैं और फिर छह हफ्ते बाद अपने लक्ष्य को निशाना बनाने से पहले एक बार फिर परीक्षण करते हैं। उनकी कंपनी ने अफ्रीका में देखा कि हैकर अपने कौशल का इस्तेमाल अंग्रेजी और फ्रेंच बोलने वाले अफीकी देशों में करते हैं। वे ऐसे संदेश भेजते हैं, मानो मछली को चारा डाल रहे हों, मगर उनके संदेश में खतरनाक मालवेयर छिपे होते हैं। साइबर हमले का यह सबसे प्रचलित तरीका है, मगर यह हमलावर की क्षमता पर निर्भर होता है, कि वह पीड़ित को अपने संदेश से किस तरह से आकर्षित कर पाता है, ताकि वह उसके द्वारा भेजे गए लिंक या अटैचमेंट को खोलने के लिए प्रेरित हो। ऑस्ट्रेलियाई साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस रॉक का आकलन है कि दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया के ऐसे देश जहां पिछले दशक में इंटरनेट का विस्तार हुआ है, वे हैकर्स के सबसे आसान शिकार होते हैं। हैकरों के लिए ये मानो प्रयोगशाला जैसे हैं, जहां वे आसानी से अपने कौशल का इस्तेमाल करते हैं।