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बच्चे भीख नहीं, शिक्षा के हकदार

अजय सेतिया
Updated Mon, 03 Jul 2017 07:31 PM IST
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अजय सेतिया
दिल्ली की इस खबर ने सबको चौंकाया, जब अपहरण किए गए एक बच्चे को बेचने के लिए एक सोशल साइट पर विज्ञापन दिखाई दिया। विज्ञापन के साथ जामा मस्जिद इलाके से अपहृत किए गए बच्चे का फोटो भी था। तीन महिलाओं ने मिलकर उस बच्चे का अपहरण किया था। चूंकि अपहरण में तीन महिलाएं शामिल थीं, इसलिए वे तीनों बच्चे को बेचकर ज्यादा रुपये पाना चाहती थीं। लेकिन वांछित रकम चुकाने वाला कोई ग्राहक नहीं मिला, तो उनके दिमाग में सोशल साइट पर विज्ञापन देने की बात सूझी। और उन्होंने बच्चे का विज्ञापन जारी कर दिया गया। एक व्यक्ति ने बच्चे को खरीदने के लिए मोल-भाव किया, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ी, तो उसने पुलिस को अलर्ट कर दिया। इस तरह तीनों महिलाएं पकड़ ली गईं।


निर्भया कांड के बाद गठित जस्टिस वर्मा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा गुम होता है, यानी हर साल 65,700 बच्चों का अपहरण होता है और उन बच्चों में से दो-तिहाई बच्चे बरामद नहीं होते। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में हर साल लगभग 44,000 बच्चे स्थायी रूप से गुम हो रहे हैं। खुद गृह मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि बरामद नहीं होने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। वर्ष 2013 और 2015 के बीच बरामद नहीं होने वाले बच्चों की तादाद में 84 फीसदी की बढोतरी हुई। गुम होने वाले बच्चों में से ज्यादातर अपहृत किए गए होते हैं, इसलिए उनकी बरामदगी नहीं होती। 80 प्रतिशत गुमशुदा बच्चों की आयु 14 वर्ष से कम होती है।


अपहृत या बहला-फुसला कर घर से भगाए गए बच्चों का विभिन्न मकसदों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सबसे छोटे बच्चे निःसंतान परिवारों को मोटी रकम के बदले बेचे जाते हैं, जैसा कि दिल्ली की ताजा घटना से सामने आया है। कुछ बच्चे विदेशियों को भी मोटी रकम के बदले गोद दिए जाते हैं, इसमें कई एनजीओ की साझेदारी भी कई बार सामने आ चुकी है। इसलिए भारत सरकार ने पिछले साल जुवेनाइल जस्टिस कानून को नए सिरे से ड्राफ्ट किया है, ताकि कानूनी तौर पर बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाया जा सके। अगर गोद लेने की प्रक्रिया सरकारी भ्रष्ट तंत्र के हाथ से निकलकर वास्तविक सामाजिक ढांचे का विकास करके, उसके सुपुर्द हो गई, तो गोद देने के मकसद से होने वाले नन्हे बच्चों के अपहरण में गिरावट आ सकती है।


बड़े गैंग को बेचने के लिए थोड़े बड़े बच्चों का अपहरण किया जाता है या उन्हें विभिन्न गांवों-कस्बों से काम दिलाने के नाम पर बहला-फुसलाकर लाया जाता है। उनमें से कुछ का इस्तेमाल विदेशियों को सेक्स उपलब्ध करवाने, नशीली दवाओं के परिवहन और भीख मंगवाने के लिए किया जाता हैं। सभी राज्य सरकारों को कानून बनाकर बच्चों को भीख देने पर रोक लगानी चाहिए, जैसा कि उत्तराखंड की नई सरकार ने इस मामले में पहल करके कानून बनाया है।


 आम तौर पर आदमी की प्रवृति होती है कि वह बच्चा देखकर ज्यादा भीख देता है, लेकिन यही प्रवृत्ति बच्चों के अपहरण का बड़ा कारण है। भीख मंगवाने वाले गिरोह बच्चों का अपहरण कर लेते हैं और उन्हें दयनीय दिखाने के लिए उनका अंग-भंग भी कर देते हैं। जब हम बच्चों को भीख देते हैं, तो हम उनका भविष्य खराब कर रहे होते हैं। जब बच्चों को शिक्षा के अधिकार कानून के तहत स्कूलों में होना चाहिए, वे सड़कों पर भीख मांगते हैं। यह शिक्षा, समाज कल्याण और श्रम विभाग, तीनों की लापरवाही के कारण हो रहा है। 
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