समृद्ध और विकसित देशों में लचर प्रशासनिक स्थिति ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ की याद दिलाती है। कृपया इस स्थिति की कल्पना कीजिए : जी-7 समूह के एक देश के, जिसकी जीडीपी 30 खरब है, प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों के साथ सड़क पर एक गड्ढे के सामने खड़े हैं। विगत 17 नवंबर को ब्रिटिश प्रधानमंत्री के आधिकारिक एक्स हैंडल ने एक तस्वीर जारी की। सड़क के गड्ढों को ठीक करने के लिए आठ अरब पाउंड आवंटित करने की घोषणा के साथ उसमें यह गर्वोक्ति भी थी कि 'यह किसी राजनेता द्वारा सड़क के गड्ढे की ओर इशारा करने का आखिरी मामला होगा।'
शासन में ऐसे गड्ढों या अवरोधों की बड़ी कीमत वहां के नागरिकों को चुकानी पड़ रही है। ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स ने हाल ही में एक आंकड़ा जारी किया : 'अस्पताल में इलाज कराने की वेटिंग लिस्ट विगत सितंबर में बढ़कर लगभग 78 लाख हो गई।' एनएचएस (नेशनल हेल्थ सर्विस) के मुताबिक, सामान्य और चिकित्सकीय परामर्श चाहने वाले मरीजों को अधिक से अधिक 18 सप्ताह तक इंतजार करना पड़ सकता है। पर 2016 से यह इंतजार 18 सप्ताहों से कहीं ज्यादा है। बदहाली स्वास्थ्य सेवा तक सीमित नहीं है। स्कूली शिक्षा भी बाधित हो रही है। इस महीने की शुरुआत में सरकार ने 231 खतरनाक स्कूलों की सूची जारी की। दरअसल भवन निर्माण में लाइटवेट कंकरीट का इस्तेमाल करने से इन भवनों के ढह जाने का खतरा है। नतीजतन इन स्कूलों के छात्रों को अस्थायी कक्षाओं में भेजा गया है। ब्रिटेन में सिर्फ नागरिक ही नहीं भुगत रहे, सरकार की स्थिति भी ठीक नहीं। विगत 18 महीनों में इस देश ने तीन प्रधानमंत्री देखे हैं, और एक बार फिर प्रवासियों के मुद्दे पर सरकार गिरने की आशंका है। संकट में सिर्फ ब्रिटेन नहीं, बल्कि पूरा यूरो जोन ही आर्थिक मंदी की ओर जा रहा है। यूरोपीय संघ की आर्थिक विकास दर घटकर 1.7 फीसदी रहने वाली है। ऐसा क्यों है? यूरोपीय सेंट्रल बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री फिलिप लेन कहते हैं : 'अनेक देश 1990 के दशक में आर्थिक रूप से जहां खड़े थे, आज वहां से काफी पीछे चले गए हैं। समय के साथ आर्थिक सुधार रोक दिए गए।' इस आर्थिक गतिरोध के नतीजे बहुआयामी हैं। यूरोप हड़तालों से प्रभावित है। फ्रांस में श्रमिक संघों से जुड़े कामगार पहले मार्च, फिर अक्तूबर में हड़ताल पर चले गए। विगत सात दिसंबर को जर्मनी में ट्रेन ड्राइवर अपनी मांग न माने जाने पर हड़ताल पर चले गए थे-जो इस साल उनकी चौथी हड़ताल थी। इटली, फ्रांस, बेल्जियम और यूनान के हवाई अड्डों पर हड़ताल से न सिर्फ हवाई यातायात बाधित हुआ, बल्कि इससे यूरोपीय लोगों के छुट्टियों पर जाने की योजना भी प्रभावित हुई। हवाई अड्डों पर हड़ताल के लगातार मामलों को देखते हुए टाइम आउट जैसे प्रकाशन को यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी कर बताना पड़ा कि दिसंबर में 10, 12, 15–17, 19 और 22–31 हड़ताल की तारीखें हैं।
अर्थशास्त्र राजनीति को प्रभावित करता है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए दूसरे मुल्कों को अपना उपनिवेश बनाने वाले और अफ्रीका व अन्य देशों से बड़ी संख्या में श्रमिकों को लुभाकर ले जाने वाले विकसित देश आज प्रवासन-विरोधी हिंसा के केंद्र बन गए हैं। जबकि याद किया जा सकता है कि जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, डेनमार्क और स्वीडन जैसे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को आकार देने के लिए कभी 'गेस्ट वर्कर्स' प्रोग्राम शुरू किए थे। ऐसे ही, विश्वयुद्ध के बाद अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए जर्मनी ने तुर्किये, मोरक्को और ट्यूनीशिया से 20 लाख कामगार बुलाए थे। जबकि फ्रांस ने उत्तर अमेरिका से श्रमिकों को अपने यहां आकर्षित किया था। आज उसका उल्टा हो रहा है।
दशकों से यूरोप अपनी सुरक्षा जरूरतें नाटो से और आर्थिक जरूरतें चीन से आउटसोर्स करता रहा है। लेकिन वह दौर अब खत्म हो चुका है। यूरो जोन में उत्पादकता रसातल में है, इसकी आबादी सिकुड़ रही है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए उन्हें प्रवासी कामगार चाहिए, पर इसके तमाम देश प्रवासन-विरोधी नीतियों की प्रयोगशाला बन गए हैं। फ्रांस, स्वीडन, आयरलैंड और जर्मनी के दक्षिणपंथी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ सड़कों पर हैं। इटली, हंगरी और स्लोवाकिया जैसे देशों के चुनावी नतीजे इसी के अनुरूप हैं। जिस नीदरलैंड्स की अर्थव्यवस्था प्रवासियों द्वारा निर्मित है, उसने हाल ही में प्रवासन-विरोधी और दक्षिणपंथी गीर्ट विल्डर्स को नेता चुना।
अमेरिका में अर्थव्यवस्था बेशक ठीक है, लेकिन राजनीति अराजकता में बदल गई है। मानवाधिकारों पर पूरी दुनिया को ज्ञान देने वाले अमेरिका में महिलाओं का अधिकार खतरे में है। उसकी स्वास्थ्य सेवा ध्वस्त हो चुकी है। विगत 12 महीनों में वहां दवाओं के ओवरडोज से 1,06,842 लोग मारे गए हैं। विगत छह दिसंबर तक वहां भीड़ पर गोलीबारी के 633 मामले सामने आए थे। राजनीतिक नेतृत्व निश्चित रूप से मायने रखता है, लेकिन फिलहाल तो यही लगता है कि अमेरिका में दो वृद्धों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। एनबीसी के एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक, 70 फीसदी लोगों को बाइडन पसंद नहीं है, जबकि 60 प्रतिशत लोग ट्रंप को राष्ट्रपति के रूप में नहीं देखना चाहते।
विकसित दुनिया के जरिये तीसरी दुनिया में जो दृश्य उभरकर आते हैं, वे दुखद हैं। अपनी तरक्की के जरिये चीन अधिनायकवादी शासन व्यवस्था का औचित्य ठहराना चाहता था, लेकिन उसकी विफलता ने उसे बेनकाब कर दिया है। विकसित देशों की विफलता यह उजागर करती है कि कानून आधारित लोकतांत्रिक विश्व का विचार क्यों लड़खड़ा रहा है।